किशोरी के परिजन ने आरोपी के मोबाइल नंबर, यूपीआई नंबर, बैंक के खाते, परिजन के नाम और मोबाइल नंबर दिए, जिनसे उसकी लगातार बात हो रही थी। यूपीआई से लेन-देन करता था। इसके बावजूद पुलिस किशोरी को मुक्त नहीं करा सकी। किशोरी के परिजन ने बाल अधिकार कार्यकर्ता नरेश पारस से मदद मांगी। पारस ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण की याचिका दायर कराई।
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मां की ओर से अधिवक्ता ने किशोरी का जन्म प्रमाणपत्र, हाईस्कूल का प्रवेशपत्र, आधार कार्ड आदि न्यायालय में प्रस्तुत किए। जिस पर हाईकोर्ट ने सुनवाई करते हुए पुलिस को निर्देश जारी किए कि जांच अधिकारी किशोरी का धारा 180 के अंतर्गत बयान दर्ज करें। दो सप्ताह के अंदर धारा 183 का बयान दर्ज करने के लिए संबंधित मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करें। बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में कहा गया कि किशोरी को अवैध रूप से हिरासत में रखा गया है। एसएचओ किशोरी को अगली तिथि 5 मई को हाईकोर्ट में पेश करें।