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अपनों के इंतजार में बूढ़ी आंखें: आगरा के रामलाल वृद्धाश्रम में 10-15 वर्षों से रह रहे कई बुजुर्ग

Sat, 01 Oct 2022 04:08 PM IST
मुकेश कुमार संवाद न्यूज एजेंसी, आगरा

सार

आगरा के रामलाल वृद्धाश्रम में रह रहे 300 से अधिक बुजुर्गों में से 40-50 इस पीड़ा से गुजर रहे हैं। इनकी आंखें हर दिन अपनों की राह देखती हैं।
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रामलाल वृद्धाश्रम - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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जिन बच्चों को मां अपने आंचल में छुपाए रखती थी और पिता अपने कंधे पर बिठाकर इतराया करते थे, वे बच्चे अब बड़े होकर उनकी सुध तक नहीं लेते। सुबह उम्मीद के साथ होती है कि बेटा आएगा। साथ नहीं ले जाएगा तो हालचाल तो लेगा ही। कोई नहीं आता तो शाम निराशा में ढल जाती है। 

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यह व्यथा है उन बुजुर्गों की जो अपनों से 10-15 साल से नहीं मिले। आगरा के रामलाल वृद्धाश्रम में रह रहे 300 से अधिक बुजुर्गों में से 40-50 इस पीड़ा से गुजर रहे हैं। इनकी आंखें हर दिन अपनों की बाट देखती हैं। अपनों की बातें करते हुए इनकी आंखों से आंसू बहने लगते हैं। 

उनको गलती का अहसास जरूर होगा

बेलनगंज के 68 वर्षीय मदनलाल वर्मा ने बताया कि घर से आए हुए 11 साल हो गए हैं। दो बेटे हैं। दोनों की शादी के बाद घर में बहुओं ने रहना मुश्किल कर दिया था। बेटे भी बदल गए। शिकायत की तो बोले कि आपको जहां अच्छा लगे, चले जाओ। तब से आश्रम में रह रहा हूं। हर रोज सोचता हूं बेटों को अपनी गलती का अहसास होगा और वो मुझे ले जाएंगे। 

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न जाने कैसा दिखता होगा मेरा बेटा

75 वर्षीय मीरा देवी ने कहा कि मेरा बेटा अब पता नहीं कैसा दिखता होगा। मैंने उसे बहुत दिनों से नहीं देखा। अब तो आंखें धुंधला गई हैं। 10 साल से आश्रम में रह रही हूं। बेटा कभी उनसे मिलने नहीं आया और न ही कभी फोन पर हालचाल जाना। इतने वर्षों में बेटा शायद मुझे भूल गया, लकिन ये मां तो उसे याद करती है और करती रहेगी।

बात कर करते हैं मन हल्का

बुजुर्गों का कहना है कि अब यही उनकी दुनिया है। खुश रहने की कोशिश करते हैं। ममता, फूलवती, कुसुम, विनोद कुमार, महेश अग्रवाल ने बताया कि आपस में बात कर मन हल्का हो जाता है। भजन-कीर्तन में समय निकल जाता है। 

बेटे-बहू नहीं देते थे खाना

लक्ष्मी नगर, दिल्ली निवासी राजरानी गोयल भी आश्रम में 10 साल से रह रही हैं। उन्होंने बताया कि बेटे-बहू ने उन्हें कमरे में बंद करके रखा हुआ था। कई दिनों तक खाना नहीं देते थे। एक दिन आश्रम आ गई। 
 
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