जिन बच्चों को मां अपने आंचल में छुपाए रखती थी और पिता अपने कंधे पर बिठाकर इतराया करते थे, वे बच्चे अब बड़े होकर उनकी सुध तक नहीं लेते। सुबह उम्मीद के साथ होती है कि बेटा आएगा। साथ नहीं ले जाएगा तो हालचाल तो लेगा ही। कोई नहीं आता तो शाम निराशा में ढल जाती है।
यह व्यथा है उन बुजुर्गों की जो अपनों से 10-15 साल से नहीं मिले। आगरा के रामलाल वृद्धाश्रम में रह रहे 300 से अधिक बुजुर्गों में से 40-50 इस पीड़ा से गुजर रहे हैं। इनकी आंखें हर दिन अपनों की बाट देखती हैं। अपनों की बातें करते हुए इनकी आंखों से आंसू बहने लगते हैं।
उनको गलती का अहसास जरूर होगा
बेलनगंज के 68 वर्षीय मदनलाल वर्मा ने बताया कि घर से आए हुए 11 साल हो गए हैं। दो बेटे हैं। दोनों की शादी के बाद घर में बहुओं ने रहना मुश्किल कर दिया था। बेटे भी बदल गए। शिकायत की तो बोले कि आपको जहां अच्छा लगे, चले जाओ। तब से आश्रम में रह रहा हूं। हर रोज सोचता हूं बेटों को अपनी गलती का अहसास होगा और वो मुझे ले जाएंगे।