दुनिया में सबसे ज्यादा चूड़ियों का उत्पादन करने वाले व भारत में कांच की चूड़ियों के एकमात्र उत्पादक फिरोजाबाद में चूड़ी उद्योग में श्रमिक दयनीय हालत में हैं। चमचमाती रंग - बिरंगी चूड़ियां बनाने वालों की जिंदगी रंगहीन और फीकी है। जिले की 70 से ज्यादा कंपनियों में पांच लाख से ज्यादा श्रमिक काम करते हैं लेकिन 93 फीसदी मजदूर दिहाड़ी हैं। 7 फीसदी ऐसे लोग हैं जिन्हें ईएसआई की सुविधा मिलती है, बाकी सभी को शाम को मजदूरी मिलती है और सुबह होने तक खर्च हो जाती है। दूसरे दिन फिर 1200 डिग्री सेल्सियस तापमान और कारखाने में बिखरे कांच के टुकड़ों के बीच 8 घंटे श्रम करने की मजबूरी होती है । ऐसे हजारों परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी काम करते चले आ रहे हैं। दुनिया भर में देश का नाम रोशन करने वालों की जिंदगी में कोई बदलाव नहीं आया। सरकारी राशन और आवास न मिले तो ये झुग्गी झोपड़ियों में जिंदगी बिताते नजर आते। इनकी जिंदगी ठीक कीट-पतंगों जैसी है जो रोशनी के आगे-पीछे मंडराते-मंडराते खत्म हो जाते हैं।
नगर भाऊ के एक कारखाने में टूटी -फूटी चूड़ियों को तसले में भरकर भट्टी के पास डाल रही राजो करीब 10 साल से यह काम कर रही है। परिवार के अन्य सदस्य भी इसी काम में जुटे हैं। 240 रुपये मजदूरी पाने वाली नगला भाऊ निवासी राजो बताती है कि नंगे हाथों से काम करने से कई बार भंगार में पड़ी चूड़ियां हाथों में भी लग जाती हैं। कांच मांस में गड़ जाता है, हाथ कट जाते हैं खून निकल आता है, कुछ देर का दर्द और फिर उसी काम में जुट जाते हैं। अब तो जैसे दर्द और चुभन की आदत सी हो गई है। बच्चों और अपना पेट भरने के लिए ये सब करना पड़ता है। ये हालत अकेले राजो की नहीं है बल्कि इन जैसे हजारों मजदूरों की है। अकेले तार इसी फैक्टरी में टूटी बिखरी कांच की चूड़ियों के बीच 1200 डिग्री सेल्सियस तापमान की भट्टी में से धातु की रोड के जरिए पिघले कांच यानी लोम को ले जा रहे हवाई चप्पल पहने अनवर बताते हैं कि काम करते करते इतना पसीना निकल जाता है कि बार-बार पानी पीना पड़ता है। कुछ लोगों की तबीयत भी खराब हो जाती है। सुविधा के नाम पर कुछ नहीं हैं। दस्ताने तो छोड़िए जूते भी नहीं हैं । कई बार जमीन पर पड़ा कांच चप्पल को फाड़ते हुए पैर में चुभ जाता है। खून निकलता है थोड़ी देर बाद फिर काम में जुट जाते हैं। यहां दवा की कोई व्यवस्था नहीं है। कई बार जल भी जाते हैं लेकिन काम तो करना है इसिलए अब आदत सी हो गई है।
कारखाने के बाद घरों में भी बिना सुरक्षा उपकरणों के काम
कारखाने से चूड़ी आने के बाद ज्यादातर काम महिलाओं के जिम्मे होता है, चूड़ी की झलाई, जुड़ाई, चकलाई, कटाई, छटाई और कलर चपाई तक में महिलाएं नंगे हाथों से काम करती हैं। इनके लिए कोई सुरक्षा उपकरण नहीं होते। थकान , चक्कर, आंखों में जलन, उगंलियों में जलने के निशान जैसी समस्याएं इनके लिए आम बात है। संतनगर की राजवती बताती है कि उनका बेटा, बहू, पोता-पोती सभी चूड़ियों के काम में लगे हैं। चूड़ी की चकलाई यानी अच्छी खराब चूड़ी छांटने में कई बार हाथ में कांच चुभ जाता है, चूड़ी की गोलाई के भीतर कहीं खुरदरापन तो नहीं ये जांचने में भी हाथ कट जाते हैं।
पिछले कई सालों से मजदूरों के लिए लड़ रहे रामदास मानव बताते हैं कि नियम के मुताबिक फैक्टरी में काम करने वाले मजदूरों को अग्निरोधक वस्त्र, दस्ताने, हेलमेट दिए जाने चाहिए लेकिन इन्हें कुछ मिलता नहीं। 8 से 12 घंटे काम करते -करते ये मजदूर गंभीर बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। महिलाओं पर घर और चूड़ियों के काम की दोहरी जिम्मेदारी होने के चलते ये मजदूर कांच के कणों को रोज सांस के जरिए पीते हैं।
झलाई करते समय आग से 300 झुलस गए, 16 की मौत
चूड़ी जुड़ाई के लिए केरोसिन की जरूरत होती है लेकिन यह उपलब्ध नहीं होता, उपलब्ध होता है तो एमपीअो जो ज्यादा ज्वलनशील है। इसकी वजह से पिछले पांच सालों में 300 से ज्यादा चुड़ी श्रमिक जल चुके हैं और 16 लोगों की जान जा चुकी है। चूड़ी जुड़ाई का ज्यादातर काम घरों पर होता है, महिलाएं इस कार्य में बच्चों के साथ लगी रहती हैं। जुड़ाई के समय जो भी हादसे हुए किसी को कोई मदद नहीं मिली। कंपनी काम कराने के लिए ठेकेदारों को रखती है और ठेकेदार घर-घर काम बांट देते हैं। घर पर ही काम मिल जाता है इसलिए आसानी से लोग इसे करने के लिए तैयार हो जाते हैं और कंपनी मालिक आसानी से अपनी जिम्मेदारी से बच जाते हैं।
केस नं. 1
शहर के अंबे नगर निवासी अंजली देवी (22) की चूड़ी करते समय 8 मार्च 2024 को झुलसकर मौत हो गई। पति सुनील भी झुलस गया। देवर अनिल की आंखों की रोशनी चली गई। कारखाने वाले या ठेकेदार ने कोई मदद नहीं की बल्कि मजदूरी के पैसे भी नहीं दिए। इलाज पर करीब सात लाख रुपये खर्च हो गए । सरकार से भी कोई मदद नहीं मिली। म़तक अंजली की बड़ी बेटी मानसी तीन साल और छोटी बेटी चित्रा की उम्र डेढ़ साल है। अब इनकी गुजर बसर कैसे होगी इसका जवाब पति सुनील के पास भी नहीं है।
केस नं.2
उत्तर थाना क्षेत्र के बिहारी नगर निवासी रामानंद के घर में चूड़ी जुड़ाई करते समय 6 मई 2023 को डिब्बी फट गई थी जिसमें चार लोग झुलस गए थे। इनमें से तीन की मौत हो गई। पांच दिन के अंतराल में बहू किरण (42), सास राजवती (60) और भतीजे दीपक (18) की जान चली गई। किसी ने कोई मदद नहीं की। इसके लिए धरना -प्रदर्शन भी हुआ लेकिन कोई काम नहीं आया। आज भी इनका परिवार 12 फीट की कोठरी में 6 सदस्यों का परिवार रहना, खाना-पीना और चूड़ी जुड़ाई का काम कर रहा है।
लोहे की प्लेट, मिट्टी का तेल, लैंप, सिलिंडर का खर्च मजदूरों के जिम्मे
मजदूर नेता रामदास का कहना है कि सदाई, छटाई, चकलाई के अलावा चूड़ियों को जोड़ने के लिए जो लैंप जलाई जाती है उसमें 14 तोड़ों में एक लीटर मिट्टी का तेल लग जाता है। कारखाने से चूड़ी आने के बाद उसे अंतिम रूप देने में लैंप, लोहे की प्लेट, गैस सिलिंडर भी लगता है। इन सभी का खर्च मजदूरों को खुद उठाना पड़ता है।
मोहल्ले के हिसाब से कम या बढ़ती मिलती है मजदूरी
रामदास का कहना है कि फिरोजाबाद में हर मोहल्ले में चूड़ी काम में लगे मजदूरों की मजदूरी अलग-अलग है। अल्पसंख्यक क्षेत्र में एक तोड़े की सदाई 7 रुपये मिलती है तो वहीं कर्बला, मथुरा नगर जैसे एरिया में सदाई -झलाई के 8 रुपये मिलते हैं। मक्खनपुर जहां ज्यादार अनुसूचित जाति के लोग रहते हैं वहां एक दिन में एक जोड़े के अब भी 7 से 8 रुपये मिलते हैं।
काम के बदले मिलती है सिलकोसिस, टीबी, त्वचा रोग, आंखों की बीमारी
चूड़ी बनाने के लिए ज्यादा मात्रा में रेत का प्रयोग होता है, रेत उड़कर सांस में जाता है इससे उन्हें सिलकोसिस नामक बीमारी हो जाती है। यहां ज्यादातर बिना मास्क के ही काम करते हैं। इसिलए यहां के श्रमिकों में टीबी आम बीमारी है। एक शोध के अनुसार कांच बनाने में रेत का इस्तेमाल होता है। सांस लेने पर सिलिका के कण सांस द्वारा फेफड़ों में चले जाते हैं और धीरे-धीरे फेफड़ो में सूजन आ जाती है। समय के साथ फेफड़े कठोर होने लगते हैं, अगर कोई व्यक्ति लगातार 10 साल तक काम करे तो उसमें सिलकोसिस बीमारी के लक्षण दिखने लगते हैं। फेफड़े कठोर होने से खांसी बलगम आना, सांस फूलना और कमजोरी जैसी समस्याएं सामने आती हैं। रेस्परेटर फेल्योर होने से व्यक्ति की जान तक चली जाती है।
सिलकोसिस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में नहीं फैलता लेकिन इसमें टीबी की आशंका ज्यादा होती है। सिलिका की वजह से बाहर के कीटाणुओं से फेफड़ों की रक्षा करने वाली कोशिकाएं ठीक से काम नहीं करती और टीबी संक्रमण फैलने लगता है, जिस व्यक्ति को टीबी होती है उसके घर के लोगों में भी यह तेजी से फैलने लगती है। इस तरह कांच का काम करने वालों में टीबी की आशंका बढ़ जाती है। सिलकोसिस के मरीजों में कैंसर की आशंका भी बढ़ जाती है। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार ज्यादातर श्रमिक फेफड़े, स्किन और आंखों से जुड़ी बीमारी लेकर आते हैं। अंबे नगर के घर में एक छोटे से कमरे में सात मजदूर चूड़ियों की सदाई का काम करते हुए कहते हैं कि एक दिन में हम जितना काम करते हैं उस हिसाब से हमें 500 से 700 रुपये मिलने चाहिए लेकिन मिलते हैं 300 रुपये तक। अगर एक दिन कमाई न करें तो बच्चे भूखे ही रह जाएंगे। कमरे का किराया भी नहीं निकलेगा। न जाने कितने मजदूर कर्ज में डूबे हैं। भोजन पर खर्च करने से ज्यादा दवा पर खर्च करना पड़ता है।
मजदूरों की मंडियां... सब्जियों की तरह मोलभाव
फिरोजाबाद में 9 जगहों पर मजदूरों की मंडियां लगती हैं। रेलवे रोड, कोल साइडिंग रोड,पुरुषोत्तम नगर, सदर बाजार,मैनपुरी गेट, मक्खनपुर, पुराना बाईपास और बड़ा बाई पास रोड पर सुबह चार बजे सुबह छह बजे मंडियां सजती हैं। कारखाने के ठेकेदार आते हैं और सब्जी की तरह मोल भाव करके आठ घंटे के लिए उन्हें अपने साथ ले जाते हैं। तय कीमत 240 और 380 है लेकिन मोलभाव में कभी-कभी पांच सौ रुपये तक मजदूरी मिल जाती है। कारखानों में काम करने वालों की मजदूरी 380 रुपये जबिक भंगार का काम करने वाली महिला को मात्र 240 रुपये मिलते हैं। कई बार तमाम मजदूर ऐसे भी रह जाते हैं जिन्हें काम ही नहीं मिल पाता, ऐसे में निराश मजदूर लौटकर घर चले जाते हैं। ये सब मजदूर आसपास के गांवों से रोज साइकिल से आते हैं और काम करके लौट जाते हैं।
खप रही जिंदगी... जितनी आमदनी, उतना खर्चा
कौशल्या नगर, जलेसर रोड निवासी दिनेश कुमार बताते हैं कि परिवार में छह सदस्य हैं। दिनेश के अलावा पत्नी और चार बच्चे। 11 साल की उम्र से वह काम कर रहा है। 35 साल हो गए चूड़ी जुड़ाई का काम करते-करते। पिता मोहर सिंह भी यही काम करते थे और उनके दादा भी चूड़ी जुड़ाई के काम में ही लगे थे। 46 साल की उम्र हो चुकी है। आज भी 10 से 12 तोड़ों की जुड़ाई कर पाते हैं। 12 रुपये प्रति जोड़े के हिसाब से उसे केवल 150 रुपये मजदूरी पूरे दिन में पड़ती है। इसी तरह उसकी पत्नी रेखा 140 से 150 रुपये तक कमा लेती है। दोनों की मजदूरी 300 होती है । बड़ी बेटी चांदनी सहयोग करती है तो थोड़ा बहुत और जोड़ा जोड़ पाते हैं। तीन सौ रुपये की आमदनी में घर का खर्च, चार बच्चों की पढ़ाई मुश्किल से हो पाती है। दिनेश का कहना है कि अगर सरकारी राशन और सरकारी आवास नहीं मिलता तो वे बच्चों को पढ़ाने के बारे में तो दूर अपना गुजारा भी नहीं कर पाते।
संत नगर निवासी 31 वर्षीय विमलेश बताती हैं कि वह 17 साल से बेलन लगाने का काम कर रही हैं। पति हरीश चुड़ी छटाई का काम करते हैं और ससुर चूड़ी जुड़ाई का काम दसकों से कर रहे हैं। तीन बच्चे हैं जिनमें बड़ा बेटा रिशभ (16), वरुण (14) और सबसे छोटा आयुष 11 साल का है। विमलेश को पांच बेलन के पूरे दिन में 100 रुपये तक मिलते हैं। घर पर तोड़ा भी झलती हैं जिससे 100 रुपये और कमा लेती हैं। ससुर को डेढ़ सौ रुपये और पति 300 रुपये तक कमा लेता है। पूरा परिवार मिलकर पांच सौ से छह सौ रुपये कमा पाता है। तीनों को पढ़ाने और खाने में सारा पैसा खर्च हो जाता है। सरकारी राशन मिल जाता है लेकिन सरकारी आवास आज तक नहीं मिला। आवास के लिए काफी भागदौड़ की लेकिन कोई सफलता नहीं मिली।
कारखाने में ऐसे आकार लेती है चूड़ी
चारों तरफ से खुली फैक्ट्री में गुल्लीवाले कहलाने वाले लोग लंबे धातु के पाइपों पर कांच के गर्म गोले लेकर चलते हैं। वे उन्हें कारखाने के मिट्टी और ईंट के फर्श पर आराम से ले जाते हैं, या तो कांच को आग के पास ले जाते हैं या कांच के छोटे-छोटे टीलों पर फेंकने के लिए ले जाते हैं। शोरगुल, लयबद्ध हलचल और गर्मी के बीच, कुछ लोग भट्ठी के अंदर से पिघले हुए कांच को बाहर निकालते हैं और कारीगरों को सौंप देते हैं , जो इसे एक मोटे तार की तरह एक मुट्ठा (लोहे की छड़) के चारों ओर लपेटते हैं और कांच की कुंडलियां बनाने के लिए इसे मोटर पर कुशलता से घुमाते हैं। प्रत्येक मुट्ठा से 368 चूड़ियाँ निकलती है। हर दिन एक फैक्टरी से 55,000 से 65,000 चूड़ियां बनती हैं।