काका हाथरसी के बारे में बहुत सुना और पढ़ा होगा। वो एक ऐसे किरदार थे, जिन्होंने जीते जी लोगों को खूब हंसाया, लेकिन अपने अंतिम समय में भी वो चाहते थे लोग उनके हास्यों के रस में डूबे रहे।
यूं पास आ के पलट जाती है मृत्यु, जिंदगी तो स्वयं ही हंसने का बहाना है। न रोना न रुलाना न ही दिल दुखाना, हंसते ही आना और हंसते ही जाना है। नागमणि की ये कविता दुनियाभर को हास्य रस से विभोर करने वाले काका हाथरसी पर सटीक बैठती है। दुनिया में उनके जैसी अनोखी अंतिम यात्रा किसी शख्स की नहीं रही। गरीबी और मुश्किलों में बचपन बिताने के बावजूद जीवन भर हंसी बांटते रहे और अंतिम यात्रा में ठहाके लगवा गए।
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अक्सर अंतिम यात्रा में लोग रोते और विलाप करते शामिल होते हैं लेकिन 19 सितंबर 1995 को काका हाथरसी की अंतिम यात्रा ऊंट गाड़ी से हंसी ठहाकों और नगाड़ो की गूंज के बीच बांके भवन आवास से श्मशान तक पहुंची। रास्ते में जो जन सैलाब उमड़ा, वह ठहाकों के साथ काका पर फूल बरसाता रहा। जब तक श्मशान में शरीर राख में नहीं बदला, तब तक हास्य कवियों का कविता पाठ होता रहा। यह सब उनकी अंतिम इच्छा के कारण किया गया।
अमर उजाला में 19 और 20 सितंबर 1995 को प्रकाशित खबर के अनुसार हास्य व्यंग्य कवि पद्मश्री काका हाथरसी की इच्छा थी कि बचपन में ऊंट गाड़ी पर बैठकर माैजमस्ती लिया करते थे, उसी तरह उनका पार्थिव शरीर ऊंटगाड़ी पर ले जाया जाये। उनकी शव यात्रा में लोग रोने और आंसू बहाने के स्थान पर हंसते रहें और ठहाके लगाएं।
काका की शव यात्रा
काका की इच्छानुसार उनकी महायात्रा के लिए ऊंटगाड़ी को सजाकर भव्य रूप दिया गया। गाड़ी पर लगाए गए बैनर पर हास्य व्यंग्य का आका काका, चल दिया करके धूम धड़ाम, हिंदू मुस्लिम सिख, ईसाई मिलकर हंसना सारे भाई, काका ने सबको मिलकर बांटा हास, इसीलिए हाथरस नगर बन गया खास लिखा गया। इस यात्रा में सबसे आगे बैलगाड़ी में भजन-कीर्तन मंडली चल रही थी। पीछे विभिन्न क्षेत्रों की बड़ी-बड़ी हस्तियां शामिल थीं। अंतिम यात्रा शहर के बांके भवन आवास से सादाबाद गेट, चांवड़ गेट, सब्जी मंडी, पत्थर बाजार, सराफा बाजार, क्रांति चाैक, घंटाघर, इगलास अड्डा होते हुए पत्थर वाले श्मशान स्थल पहुंची।
हंसी ठहाके का जिम्मा कवियों पर
काका हाथरसी की अंत्येष्टि में कवि सम्मेलन का जिम्मा देश के जाने माने कवि आशु कवि निर्भय हाथरसी, डाॅ. वीरेंद्र तरुण, डाॅ. राकेश शरद, डाॅ. पप्पे व सुरेश चतुर्वेदी को साैंपा गया था।
ऊंटगाड़ी से बचपन का था संबंध
प्रभु दयाल गर्ग उर्फ काका हाथरसी का ऊंटगाड़ी से बचपन का संबंध था। 1910 के दशक में छात्र जीवन में जब वह इगलास में पढ़ते थे तब कार, स्कूटर, जीप मोटर गाड़ी तो दूर रिक्शा भी नहीं था। तो वह पढ़कर लाैटते समय रास्ते से गुजरने वाली ऊंटगाड़ी पर चढ़ जाते थे और माैजमस्ती करते घर पहुंचते थे।