चंदामामा, नंदन, चंपक...। आजकल कुछ ही बच्चे इन नामों से परिचित होंगे। बच्चों की ये पत्रिकाएं बाल जगत से गायब होती जा रही हैं। इन पत्रिकाओं और कहानी की किताबों के बजाय बच्चों के हाथ में मोबाइल और रिमोट है।
राजा की मंडी स्थित पुस्तक विक्रेता राकेश शर्मा 60 साल से पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों की दुकान चला रहे हैं। बोले कि बच्चों की किताबों को खरीदने तो छोड़ो पूछने के लिए भी इक्का-दुक्का लोग ही आते हैं। पांच-सात साल पहले तक स्थिति ठीक थी। बाल साहित्य की किताबें सबसे ज्यादा बिकती थीं। माता पिता के साथ आया बच्चा कहानी की किताब, पत्रिका की जिद किया करता था। लेकिन महीने भर में कोई एक-दो लोग आ जाएं तो भी बहुत है। पहले जहां सौ किताबें बिकती थीं तो अब मात्र 20 ही बिकती हैं। मांग कम होने से अब कई पुस्तकें आना बंद हो गई। अब हम भी बाल साहित्य कम रखते हैं।
परी की पायल, उजली धूप, सातवां जन्म, बोलते खंडहर, मां और मैं...50 से ज्यादा बाल पुस्तकों की लेखिका पद्श्री ऊषा यादव का कहना है कि हमारी पीढ़ी ने जीवन की नैतिक शिक्षा बाल साहित्य से सीखी। चंदा मामा दूर के... मछली जल की रानी है... कविताएं और बाल भारती, पराग, नंदन आदि पत्रिकाओं के लिए हम लालायित रहते थे। लेकिन आज बच्चे बाल साहित्य से दूर होते जा रहे हैं। इसी कारण धीरे-धीरे बच्चों की पत्रिकाएं बंद हो रही हैं। माता-पिता भी पाठ्यपुस्तकों के अलावा कोई पुस्तक, बाल साहित्य लाकर नहीं देते। घर में बच्चों की किताबें और पत्रिकाएं होंगी तो रुचि बढ़ेगी।
- मोबाइल से संपर्क बढ़ गया है।
- इंटरनेट पर सर्च की आदत बनी।
- ऑनलाइन गेम्स ने भी बढ़ाई दूरी।
- घरों में पत्र-पत्रिकाएं आना कम हो गईं।
- कोर्स के अलावा अन्य किताब नहीं आती।
बच्चों के गांधी कहे जाने वाले द्वारिका प्रसाद महेश्वरी ने बाल साहित्य पर 26 पुस्तकें लिखीं। उनके पुत्र आगरा कॉलेज के पूर्व प्राचार्य विनोद कुमार महेश्वरी ने बताया कि पिता की कविताएं बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल हैं। तब के दौर में बच्चों के लिए मनोरंजन का साधन केवल बाल साहित्य ही हुआ करता था। लेकिन अब बच्चों के पास अन्य विकल्प हैं। पुस्तकों में रुचि कम हो गई है। माता-पिता भी उन्हें पाठ्य पुस्तकों से अलावा पुस्तक पढ़ने के लिए प्रेरित नहीं कर रहे।
टेलीविजन, इंटरनेट और मोबाइन ने वर्तमान में किताबों का स्थान घेर लिया। सामाजिक स्तर पर परिवार इतना सीमित हो गए है कि बच्चे किसी से घुल मिल ही नहीं पाते और उनके पास मनोरंजन के नाम पर मोबाइल ही रह गया है। इसके अलावा अब पढ़ाई भी मोबाइल पर होने लगी है। जिसकी वजह से किताबों की तरफ उनकी रूचि लगातार कम होती जा रही है। इसके अलाव तरह-तरह के गेम्स अब बच्चों के मनोरंजन का साधन हो गई हैं जो कभी बाल साहित्य की पुस्तकें हुआ करती थी।
बाल साहित्यकार डॉ. सुषमा सिंह ने कहा कि माता-पिता अपने बच्चों के लिए बाल साहित्य की किताबें खरीदें और उन्हें पढ़कर सुनाएं और उनसे सुनें। बच्चों को किताब पढ़ने की आदत डालें। ज्ञान किताबों में है न कि मोबाइल और टेलीविजन में।
साहित्यकार डॉ. शेषपाल सिंह ने बताया कि मोबाइल वर्तमान में बच्चों की जरूरत बन गया है, लेकिन वे पुस्तकों का भी दामन थामे रहेंगे तो उनके भविष्य के लिए अच्छा होगा। मोबाइल पर की गई पढ़ाई हम एक समय बाद भूल जाते हैं, लेकिन पुस्तक का पढ़ा हमें हमेशा याद रहता है।
पराग
नंदन
शेष सखा
वानर
शिशु
कक्षा नौ की छात्रा खुशी चौरसिया ने बताया कि कोर्स इतना ज्यादा हो जाता है कि बाकी कुछ पढ़ने का मन ही नहीं होता। इसलिए अन्य पुस्तकों की तरफ ध्यान ही नहीं जाता। बाल साहित्य में ज्यादा कुछ पढ़ा नहीं है। वहीं कक्षा 10वीं के छात्र उत्कर्ष वर्मा का कहना है कि कोर्स की किताबें ही अधिक पढ़ते हैं। कोई अन्य किताब नहीं पढ़ते। इसके अलावा समय मिलता है तो मोबाइल पर अच्छी कहानियां देख लेते हैं।