अंतरराष्ट्रीय बिल्ली दिवस पर सामने आई तस्वीर बताती है कि अंधविश्वास की जगह अब पशु प्रेम ने ले ली है और कभी अपशगुनी मानी जाने वाली बिल्लियां घरों की लाड़ली बन गई हैं। किसी परिवार ने चार बिल्लियों को बच्चों की तरह अपना लिया है तो किसी ने अपनी पालतू बिल्ली के लिए घर में अलग कमरा तक तैयार कर रखा है।
कभी बिल्ली के रास्ता काटने पर लोगों के कदम ठहर जाते थे और अशुभ मानकर रास्ता बदल लिया जाता था। मगर वक्त के साथ सोच ऐसी बदली कि अब यही म्याऊं-म्याऊं करने वाली बिल्लियां घरों की लाड़ली और परिवार का अहम हिस्सा बन चुकी हैं। किसी ने इन्हें परिवार के सदस्य की तरह रखा है तो किसी ने उनके लिए अलग कमरा तक तैयार कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय बिल्ली दिवस पर शहर में बिल्लियों को लेकर बदली सोच और अपनेपन की तस्वीर दिखाई देती है।
विज्ञापन
जिसमें आत्मा है, वह पवित्र है, शुभ-अशुभ कुछ नहीं
पश्चिमपुरी निवासी पूजा त्रिपाठी ने बताया कि भारतीय संस्कृति में बिल्ली को लेकर कई तरह की मान्यताएं रही हैं, लेकिन मेरा मानना है कि जिस जीव में आत्मा है, वह हमेशा पवित्र है। जिस तरह इंसान में आत्मा होती है, उसी तरह बिल्ली में भी होती है। इसलिए उनके लिए शुभ-अशुभ जैसी कोई बात मायने नहीं रखती। मेरे घर में चार बिल्लियां हैं। इनमें तीन फीमेल और एक मेल है।
बिल्ली पसंद नहीं थी, एक दिन में बन गई परिवार का हिस्सा
सिकंदरा निवासी एकता का कहना है कि पहले मुझे बिल्लियां पसंद नहीं थीं। पति करीब दो महीने का बिल्ली का बच्चा किसी और को देने के लिए घर लेकर आए थे। एक दिन साथ रहने के बाद मुझे इससे इतना लगाव हो गया कि उन्होंने उसे किसी और को नहीं दिया। छह महीने की कुकी को बच्चे की तरह रखती हैं। घर में उसके लिए अलग कमरा है, जिसमें झूला, अलमारी और खिलौने हैं।
2019 में एक बिल्ली आई, अब चार का परिवार साथ
टेढ़ी बगिया निवासी निवासी मोहम्मद इमरोज ने बताया कि वर्ष 2019 में वह एक मेल बिल्ली घर लेकर आए थे। इसके बाद उसके लिए एक फीमेल बिल्ली भी लेकर आए। धीरे-धीरे परिवार बढ़ता गया और आज चार बिल्लियां साथ रहती हैं। इमरोज कहते हैं हमारे बच्चे तो नहीं हैं, लेकिन हमने इन्हें कभी बच्चों से कम नहीं समझा। जिस तरह माता-पिता अपने बच्चों की देखभाल करते हैं, उसी तरह हम भी इनकी हर जरूरत का ध्यान रखते हैं।