गीतांजलि श्री को मिला अंतर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार
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गीतांजलि श्री को अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिलने पर जिले में हर्ष का माहौल है। लेखिका गीतांजलिश्री का मैनपुरी से पुराना नाता रहा है। उनका जन्म 12 जून 1957 को मैनपुरी में हुआ था। लेखिका गीतांजलि श्री के पिता अनिरुद्घ पांडेय सिविल सेवा में थे। उनके जन्म के दौरान उनकी तैनाती मैनपुरी में बतौर कलेक्टर के पद पर थी। बचपन के दो साल का समय उन्होंने मैनपुरी में गुजारा। इसके बाद उनके पिता का स्थानांतरण हो गया और वे फिर कभी लौटकर मैनपुरी नहीं आईं। गीतांजलि श्री बताती हैं कि उन्हें तो मैनपुरी के संबंध में कुछ याद नहीं हैं, लेकिन उनकी मां श्री पांडेय ने उन्हें जो बताया वह आज भी याद है। वे कहती हैं कि मेरा सौभाग्य है कि मैनपुरी से मेरा जुड़ाव रहा है।
बता दें 'टॉम्ब ऑफ सैंड' विश्व के उन 13 पुस्तकों में शामिल थी, जिसे अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार के लिए लिस्ट में शामिल किया गया था। 'टॉम्ब ऑफ सैंड' प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार जीतने वाली किसी भी भारतीय भाषा की पहली किताब बन गई है।
तीन उपन्यास और कई कथा संग्रह लिखे
गीतांजलि श्री ने तीन उपन्यास और कई कथा संग्रह लिखे हैं। उनकी कृतियों का अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, सर्बियन और कोरियन भाषाओं में अनुवाद हुआ है। वहीं गीतांजलि श्री अब दिल्ली में रहती हैं और उनकी उम्र 64 साल है। उनकी अनुवादक डेजी रॉकवेल एक पेंटर एवं लेखिका हैं जो अमेरिका में रहती हैं। उन्होंने हिंदी और उर्दू की कई साहित्यिक कृतियों का अनुवाद किया है।
क्या है बुकर पुरस्कार
बुकर पुरस्कार इंग्लैंड द्वारा लेखन के क्षेत्र में दिया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार है। इसकी स्थापना सन 1969 में इंग्लैंड की बुकर मैकोनल कंपनी द्वारा की गई थी। इसमें 50 हजार पाउंड की राशि लेखक को दी जाती है। पुरस्कार के लिए पहले उपन्यासों की सूची तैयार की जाती है और फिर पुरस्कार वाले दिन की शाम के भोज में पुरस्कार विजेता की घोषणा की जाती है। पहला बुकर पुरस्कार अलबानिया के उपन्यासकार इस्माइल कादरे को मिला था।