साल 2008 में राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन खिलाड़ियों के ट्रायल चल रहे थे। एक से बढ़कर एक बल्लेबाज और गेंदबाज आए थे। 16 साल का एक लड़का चुपचाप खड़ा था। नंबर आया तो बालिंग करके दिखाई। स्विंग थी, रफ्तार थी, लय भी थी, लेकिन टेस्ट ले रहे ग्रेग चैपल को कुछ जमा नहीं।
ग्रेग चैपल राजस्थान क्रिकेट एकेडमी के निदेशक थे। सलेक्शन उन्हें ही करना था। दीपक को टॉप-50 में भी नहीं चुना। यहीं से शुरुआत हुई एक युवा क्रिकेटर के भारतीय टीम में आने के जोश और जुनून की। दीपक चाहर ने ठान लिया और आज वो मुकाम हासिल किया जो युवाओं को प्रोत्साहित करता है।
क्रिकेट की दुनिया में ताज नगरी का नाम ताज की तरह रोशन कर रहे हैं स्विंग के सुल्तान दीपक चाहर। दीपक चाहर के पिता लोकेंद्र चाहर ने दीपक को क्रिकेटर बनाने के लिए एयरफोर्स की नौकरी तक छोड़ दी। दीपक जब दस साल के थे, तब पिता ने जयपुर जिला क्रिकेट एकेडमी में उनका दाखिला कराया था। आज दीपक के चचेरे भाई राहुल चाहर भी भारतीय टीम का हिस्सा हैं। दीपक का वेस्टइंडीज के खिलाफ खेला गया टी-20 हर युवा क्रिकेट प्रेमी को अच्छी तरह से याद है।