बॉर्डर पर तैनात बेटे को तिलक लगाकर विदा करती मां
- फोटो : अमर उजाला
गलवां घाटी में हुई हिंसक झड़प में 20 जवानों के शहीद होने पर बाह के कनारी गांव के सैनिक राजपाल सिंह बुधवार को ग्लेशियर में ड्यूटी के लिए रवाना हुए। रवानगी के वक्त मां सूरजमुखी ने बेटे के माथे पर तिलक किया, आरती उतारी और बोली कि बेटा बदला लेकर लौटना।
यहां सुबह, शाम तुम्हारी सलामती के लिए दुआ मांगूगी। चीन को उसके किए की सजा मिलनी चाहिए। मां के पैर छूकर ड्यूटी के लिए निकले बेटे ने मां से कहा कि अपना ख्याल रखना।
बस्ती के लोग मां-बेटे का जज्बा देखकर आंखों में गौरव के आंसू भरे बिना नहीं रह सके। सूरजमुखी और सोबरन सिंह का बेटा राजपाल सिंह को चीन की सीमा पर लेह, लद्दाख, सिक्किम के बाद ग्लेशियर घाटी में तैनाती मिली है। सीमा पर अलर्ट के चलते उन्हें ड्यूटी पर वापस बुलाया गया है। दूसरा बेटा मान सिंह भी चीन बार्डर पर नाथूला दर्रा में नियुक्त है। जबकि बड़ा बेटा रामहेत जम्मू कश्मीर में कई आपरेशन में पाकिस्तान के दांत खट्टे करने के बाद सेवानिवृत्त हो चुके हैं।
चीन कायर, डरपोक...सैनिकों की शहादत का बदला ले सरकार
1962 में चीन के मोर्चे पर अपने चचेरे भाई रघुवीर सिंह के साथ बहादुरी से लड़े बाह के रुदमुली गांव के सर्वजीत सिंह को ल्हासा चीन में कैद कर लिया गया था। जंग के मोर्चे पर उनके साथ चचेरे भाई हवलदार रघुवीर सिंह, बहनोई असर की गढ़ी के वीरेंद्र सिंह, नवाटेड़ा के आदर्श पाल, फुफेरे भाई जगनपुरा भिंड के जसवंत सिंह भी लड़े थे। जिनमें से रघुवीर सिंह, वीरेंद्र सिंह, जसवंत सिंह शहीद हो गए थे।
सर्वजीत सिंह की भी मौत की खबर से उनकी पत्नी शकुंतला देवी को सदमा लगा। सेना की ओर से उनको जंगी अवार्ड दिया गया। 10 माह बाद सर्वजीत सिंह चीन की कैद से आजाद हुए। घर लौटे तो शकुंतला देवी ने फिर से सुहाग की चुनरी ओढ़ी। इस दौरान सर्वजीत सिंह न टूटे और न झुके।
चीन की कैद से आजाद होने के बाद 1965 में पाकिस्तान के खिलाफ जंग के मोर्चे पर पहुंच गए। 1971 में भी बहादुरी से लड़े। इतना ही नहीं अपने पुत्र रमेश सिंह को भी सेना में भर्ती कराया। कैद के दिनों को याद कर सर्वजीत सिंह और उनकी पत्नी शकुंतला देवी भावुुक हो जाती हैं। कहा कि चीन धोखेबाज है। डरपोक भी है। 1962 कि युद्ध में चीन को ज्यादा नुकसान हुआ था। उन्होंने कहा कि 20 सैनिकों की शहादत का बदला लेने की छूट सरकार सेना को दे। कहा कि भारत सरकार चीन को उसी की भाषा में जवाब दे। उन्होंने 80 साल की उम्र के इस पड़ाव पर भी जंग के मोर्चे पर जरूरत पड़ने पर जाने का ऐलान भी किया।