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उम्मीद, खारी में रेत की जगह पानी बहेगा

Mon, 30 May 2016 02:05 AM IST
अमर उजाला अागरा
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हाउ मैन को लगा कि उसका पिछला अंदाज़ा ग़लत - फोटो : BBC
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कई वर्षों बाद इस बार अच्छी बारिश की भविष्यवाणी से नदियों की राह में अतिक्रमण से तबाही का डर तो है ही, खारी जैसी मृत नदियों को जीवन मिलने की सुखद संभावना भी है। इस बरसाती नदी के आसपास रहने वालों के मुताबिक वर्ष 1998 तक नदी में पानी देखा गया। इसके बाद से नदी में रेत ही उड़ती है। मौसम विभाग भविष्यवाणी से जगी उम्मीद पर सिंचाई विभाग यहां हर तीन किलोमीटर पर चेकडैम बनाने में जुट गया है।
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फतेहपुर सीकरी के तेरहमोरी बांध से निकली इस बरसाती नदी के दोनों ओर के इलाकों में भूमिगत जल खारा है। इसी वजह से नदी का नाम भी खारी पड़ा। करीब 90 किलोमीटर का सफर तय करके यह नदी पहले उटंगन नदी में अरनौटा के पास कालिंदी की गोद में समा जाती है। क्षेत्र के बुजुर्गों ने बताया कि 1962 और फिर 1972 में नदी में बाढ़ आई थी। तब नदी का पानी दोनों ओर करीब 2-2 किलोमीटर तक फैला था। 1962 में तय किए गए हाई फ्लड लेबल (533.3 फुट) से भी 10 फुट ऊपर पानी चला था। उसके बाद खारी नदी में बाढ़ तो नहीं आई पर पानी इतना जरूर रहता था कि आसपास के खेतों की सिंचाई होती थी। मानसून के मुंह फेर लेने से 1998 के बाद नदी में केवल रेत ही रह गई। सिंचाई विभाग खारी, पार्वती और उटंगन नदी को जीवन देने की कोशिश कर रहा है। खारी नदी में भी हर तीन से चार किलोमीटर पर एक चेकडैम बनाया जा रहा है ताकि वर्ष भर के लिए बारिश का पानी एकत्र किया जा सके। इससे यहां भूमिगत जलस्तर में भी सुधार की उम्मीद है।

नदी में कर लीं है बोरिंग
नदी किनारों पर बसे गांवों अकोला, कौरई, खेड़िया, गहर्रा, बड़ा गहर्रा, नगला भुज, मोरी आदि का पानी खारा है। भूमिगत जलस्तर गिरने से सिंचाई तो दूर पीने का पानी नहीं है। ऐसे में कुछ लोगों ने नदी के पेटे में ही बोरिंग कर ली है। यहां कहीं-कहीं मीठा पानी मिल जाता है। बोरिंगों से लाइन डालकर पानी की सप्लाई की जा रही है। किसानों ने नदी के किनारे पर बने खेतों में बोरिंग की हैं। गांवों से दूरी होने के कारण अभी यहां अवैध कब्जे कम हैं पर कुछ स्थानों पर जमीन समतल कर खेती की जा रही है।
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पांच लाख रुपये बना था पुल
1965 में खारी नदी पर आगरा-तांतपुर राजमार्ग पर अकोला में बना पुल 5.44 लाख रुपये में बना था। इसकी लंबाई 97.68 मीटर है। सड़क की चौड़ाई 7.5 मीटर है। 1972 में नदी का पानी पुल के ऊपर तक पहुंच गया था। 

1989 तक नदी लबालब रहती थी। धीरे-धीरे पानी कम होता चला गया। करीब 10 वर्ष से ऐसी बारिश नहीं हुई कि पानी आए। सिंचाई विभाग बना जरूर रहा है लेकिन जब नदी में पानी ही नहीं होगा तो चेकडैम क्या करेंगे। 
सीताराम, किसान

नदी में पानी था तो किनारों पर 12 महीने फसल लहलहाती थी। जो खेत नीचे थे वहां अक्सर फसल गल जाती थी। भूमिगत जलस्रोतों से पर्याप्त पानी नहीं मिल पाता है। इसकी वजह से अब खेतों में धूल उड़ती है। 
सुनहरी लाल, किसान 

जिस जिले में आठो नदियों पर बांध और चेकडैम बनाने का वर्षों से पहले प्रस्ताव बना था लेकिन लालफीताशाही ने कुछ नहीं किया। खारी नदी पर अब चेकडैम बन रहे हैं। अच्छी बारिश हुई तो खारी नदी में जान आ सकती है।
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डीके जोशी, पर्यावरणविद्
  
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