सूर, रहीम, रसखान की रचनाओं में भी बिखरे होली के रंग
भक्तिकाल और रीति काल के कवियों ने तो फाल्गुन और होली को अपनी रचनाओं में विशेष महत्व दिया है। इनकी रचनाओं को मंदिरों में गायन किया जाता है, जिन्हें समाज गायन भी कहा जाता है। आदिकालीन कवि विद्यापति से लेकर भक्तिकालीन कवि सूर, रहीम, रसखान, पदमाकर, जायसी, मीराबाई, कबीर तथा रीतिकाल के कवि बिहारी, केशव, घनानंद आदि का उनकी रचनाओं को देखते हुए ऐसा लग रहा है जैसे होली उनका प्रिय विषय रहा हो। सूरदास ने वसंत और होली पर 70 से अधिक पदों की रचना की है।
नंदगांव निवासी साहित्यकार रामशरण शर्मा ‘शरन’ बताते हैं कि अष्टछाप के कवि सूरदास, परमानंददास, कुंभनदास, चतुर्भजदास, कृष्णदास, नंददास, छीतस्वामी, गोविंददास ने होली के पदों की तमाम रचनाएं की हैं, जो आज भी राधाकृष्ण के मंदिरों में परंपरागत गायन के रूप में गाई जाती हैं। वहीं सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया, अमीर खुसरो और बहादुरशाह जफर ने भी होली पर सुंदर रचनाएं की हैं। आधुनिक काल के कवि प्रेमचंद की राजा हरदोल, प्रभु जोशी की अलग अलग तीलियां, तेजेंद्र शर्मा की एक बार फिर होली, ओमप्रकाश अवस्थी की होली मंगलमय हो में होली के अलग-अलग रूप दिखाई देते हैं।