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हिंदी हैं हमः राष्ट्रभाषा हिंदी के बल पर आत्म गौरव का अधिकारी है भारत

Fri, 21 Aug 2020 09:25 AM IST
Abhishek Saxena न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा

सार

  • हिंदी राष्ट्र भाषा थी, है और रहेगी 
  • हिंदी व्यवहारिक, वैज्ञानिक और प्रभावमयी भाषा
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पद्मश्री मोहन स्वरूप भाटिया,डॉ. प्रतापपाल शर्मा, पूर्व प्राचार्य, आईओपी कॉलेज, वृंदावन - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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यह पूर्ण सत्य है कि कोई भी राष्ट्र अपनी भाषा से ही विकास का सुगम पथ पाता है और अपनी पहचान बनाता है। चीन, जापान, जर्मनी इसके उदाहरण हैं। भारत भी अपनी राष्ट्र भाषा हिंदी के बल पर आत्म गौरव का अधिकारी है। प्रांतीय भाषाओं और हिंदी में परस्पर बैर नहीं है, अपितु मैत्री भावना का भाव सृजित करते हुए आगे बढ़ना है। अब तो हिंदी को बाजार के रूप में अंतरराष्ट्रीय कंपनियों ने भी लिया है।
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विश्व भर के उद्योगपति और व्यापारी अपने कर्मचारियों को हिंदी सिखा रहे हैं, क्योंकि भारत अब विश्व में सबसे बड़ा बाजार बनकर उभरा है और भारत में व्यापार करने का अर्थ है हिंदी की जानकारी होना। गर्व से कहें कि हम हिन्दी हैं। गुरुवार को हिंदी के विद्वानों से अमर उजाला ने व्हाट्सएप पर संवाद किया तो अनेक बातें सामने आई हैं।

हिंदी राष्ट्र भाषा थी, है और रहेगी 
हिंदी राष्ट्र भाषा थी, है और रहेगी। हिंदी भारत की सार्वभौमिक भाषा है। संसार की अन्य भाषाओं से तुलना करें तो किसी भी राष्ट्र के लोगों की तुलना में हिंदी बोलने वालों की संख्या सर्वाधिक है। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक हिंदी ही एक मात्र ऐसी भाषा है, जो संपूर्ण भारत में समझी जाती है। भारत की अन्य भाषाओं की तुलना में सर्वाधिक साहित्य हिंदी में रचा गया है। प्राचीन काल से आज तक हिंदी का सर्वाधिक प्रचलन रहा है। हर दृष्टि से अन्य भाषाओं की तुलना में हिंदी भाषा सम्राट है, किंतु यह दुर्भाग्य है कि अभी तक हिंदी को राष्ट्रीय भाषा घोषित नहीं किया गया है। सरकार को चाहिए कि हिंदी को प्रत्येक दृष्टि से प्रोत्साहन प्रदान करे। - पद्मश्री मोहन स्वरूप भाटिया
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आदित्य चौधरी, संस्थापक, ब्रजभाषा कोश,श्रीवत्स गोस्वामी, आध्यात्मिक गुरु (बाएं से दाएं) - फोटो : अमर उजाला
हिंदी व्यवहारिक, वैज्ञानिक और प्रभावमयी भाषा
हिंदी इस देश की राष्ट्रभाषा कहीं जाती है, क्या सच्चे अर्थों में हिंदी राष्ट्रभाषा है? यह एक विचारणीय प्रश्न है। हिंदी बहुसंख्यक लोग भारतीय लोगों की भाषा है इसमें कोई संदेह नहीं है। राष्ट्रभाषा के लिए जिन विशेषताओं और मानकों की आवश्यकता है वह सभी हिंदी के पास हैं, किंतु अनेक रानीतिक कारणों तथा परस्पर के सौहार्द के अभाव में हिंदी आज भी राष्ट्रभाषा का सम्मान नहीं पा सकी है।

यह खेद का विषय है। इसका कारण गहराई से देखने पर यह स्पष्ट होगा कि हम सब हिंदी भाषी लोग आज हिंदी के मानक और उसके व्यवहारिक प्रयोग से दूर चले जा रहे हैं। हिंदी अन्य भाषाओं की तुलना से निश्चय ही व्यवहारिक, वैज्ञानिक और प्रभावमयी भाषा है। - डॉ. प्रतापपाल शर्मा, पूर्व प्राचार्य, आईओपी कॉलेज, वृंदावन


देश की भावात्मक एकता का जीवंत सूत्र है
भारतीय मनीषा यदि हिमालय है, तो भारतीय भाषाएं उसमें से निकली नदियां हैं। सभी नदियां, सभी भाषाएं, अपने आप में स्वयं समर्थ हैं, अतुलनीय हैं, परंतु गंगा की भांति हिंदी भाषा की बात अलग है। गंगा का प्रवाह गंगोत्री से गंगासागर तक अविरल है, हिंदी भाषा की परंपरा देववाणी संस्कृत से लेकर अनेक क्षेत्रीय भाषाओं को समृद्ध करती है और होती है। हिंदी का अन्य भारतीय भाषाओं से सहेली का रिश्ता है।

शास्त्र से लेकर लोक की अभिव्यक्ति की इसमें क्षमता है। गंगा की निर्मलता की भांति हिंदी की लिपि वैज्ञानिक है, जिसके लिखने, पढ़ने और बोलने में कोई अंतर नहीं आता है। देश की भावात्मक एकता का यह जीवंत सूत्र है। अत: यह कंप्यूटर के लिए भी सर्वश्रेष्ठ भाषा है।  - श्रीवत्स गोस्वामी, आध्यात्मिक गुरु
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जहां भी हिंदी बोलें, गर्व के साथ बोलें
प्रत्येक ‘विश्व हिंदी सम्मेलन’ के अवसर पर मैंने देश-विदेश से सम्मिलित हुए विद्वानों के सामने हिंदी से संबंधित जिन मुद्दों को उठाया है, उनको ही साझा कर रहा हूं। हम हिंदी में विदेशी भाषाओं के शब्दों को ज्यों का त्यों ही लें। उनके बेतुके अनुवाद के झंझट में न जाएं।

जैसे ब्राउजर को विचरक और कंप्यूटर को संगणक न लिखें, क्योंकि यह कभी व्यवहार में नहीं आ सकेगा। जहां भी हिंदी बोलें, गर्व के साथ बोलें। हिन्दी लिखने या टाइप करने के लिए सदैव देवनागरी लिपि का ही प्रयोग करें, कभी भी अंग्रेजी की लिपि याने रोमन लिपि का प्रयोग न करें, वो चाहे फ़ेसबुक, ट्विटर या व्हाट्सएप आदि कोई भी माध्यम हो। हिंदी हमारी अंतरराष्ट्रीय पहचान भी है।  - आदित्य चौधरी, संस्थापक, ब्रजभाषा कोश
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