डॉ. अचला नागर
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‘मानस का हंस’ उपन्यास आज भी पाठकों की पहली पसंद है। नाच्यौ बहुत गोपाल, खंजन नयन, महाकाल, भूख, बूंद और समुद्र, शतरंज के मोहरे, सुहाग के नूपूर, अमृत और विष, सात घूंघट वाला मुखड़ा... उनकी अमूल्य कृतियां हैं। कहानी संग्रह में वाटिका, तुलाराम शास्त्री, सिकंदरा हार गया, एक दिल हजार अफसाने, नाटक युगावतार, उतार-चढ़ाव, चढ़त न दूजौ रंग और व्यंग में नवाबी मसनद, चकल्लस, हम फिदाये लखनऊ काफी चर्चित रहीं। उन्होंने बाल साहित्य में नटखट चाची, बाल महाभारत, अक्ल बड़ी या भैंस, सात भाई चंपा...का सृजन किया।
तमाम पुरस्कारों से नवाजा
साहित्यकार अमृत लाल नागर को पद्म भूषण के अलावा काशी नागरी प्रचारिणी सभा, प्रेमचंद पुरस्कार, अखिल भारतीय वीर सिंह देव, साहित्य वाचस्पति और उत्तर प्रदेश हिंदी संस्था के सर्वोच्च भारत भारती सम्मान सहित कई पुरस्कारों से नवाजा गया। सात वर्षों के दौरान 14 फिल्में भी लिखीं, जिनमें से आठ सुपरहिट रहीं। 23 फरवरी, 1990 को उनका निधन हुआ।
आमजन से जुड़े हुए थे
पिताजी की लेखनी बहुआयामी थी। लखनऊ में रहते थे लेकिन आगरा और मथुरा से उनका विशेष लगाव था। आमजन से जुड़े हुए थे। लोक कलाकारों की बहुत इज्जत करते थे। घर पर अकसर ही साहित्यकारों का आना-जाना रहता था।
- अचला नागर, वरिष्ठ लेखिका (पुत्री)
बहुत प्यारा था उन्हें ब्रज
बचपन उनके सानिध्य में बीता। वह महान लेखक और विचारक थे। ब्रज उनको बहुत प्यारा था। अकसर ही यहां आते थे। उनकी कहानियों में ब्रज की गलियों का भी जिक्र है।
- सिद्धार्थ नागर, फिल्म निर्देशक (नवासे)
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