वर्ष 1965 में हिंदी को लेकर देश में खूब बवाल हुआ था। तमिलनाडु में रेलवे स्टेशनों पर लगे पत्थरों पर लिखे हिंदी नामों को तारकोल से पोत दिया गया था। वहीं मद्रास में बसे हिंदी भाषियों का घर से निकलना बंद हो गया था।
हर साल 14 सितंबर को हिंदी के महत्व, प्रचार-प्रसार और दुर्दशा पर लोग अपने विचार रखते हैं। भाषा को समृद्ध करने के लिए संकल्प भी लिए जाते हैं। दरअसल इसी दिन हिंदी को भारत की संविधान स्वीकृत राजभाषा स्वीकार किया गया था। राजभाषा तक का सफर हिंदी के लिए संघर्ष भरा रहा है। अब हिंदी प्रेमी देश में हिंदी को राष्ट्रभाषा स्वीकृत कराने का संघर्ष कर रहे हैं।
विज्ञापन
अमर उजाला के आर्काइव में 14 सितंबर 1995 को हिंदी की संघर्ष यात्रा का पूरा वर्णन दिया गया है। बताया गया कि राजभाषा बनने का सफर कितना मुश्किलों भरा रहा। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343(1) में हिंदी को राजभाषा स्वीकार किया गया था। अंग्रेजी को भी सीमित समय के लिए राजभाषा के रूप में स्वीकार कर लिया गया था।
तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू जो हिंदुस्तानी के समर्थक थे हिंदी विरोधियों को यह आश्वासन भी दे दिया कि वे जब तक चाहोगे, तब तक अंग्रेजी को राजभाषा के रूप में प्रयोग में लाया जाता रहेगा। उन्होंने यह भी कहा था कि हिंदी को किसी पर थोपा नहीं जाएगा। इस आश्वासन की आड़ में तमिलनाडु में जोरदार विरोध हुआ। नतीजा यह हुआ कि राजनीतिक लोगों ने पुराने प्रदर्शन का हवाला देते हुए हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित होने नहीं दिया। नागरी प्रचारिणी सभा के मंत्री चंद्रशेखर शर्मा ने बताया कि नागरी प्रचारिणी का उद्देश्य यही है कि हिंदी को अब राष्ट्रभाषा पद पर सुशोभित किया जाए। इसलिए हिंदी प्रेमियों का सम्मान करते हैं और हिंदी को बढ़ावा देने के लिए संगोष्ठियां भी कराते हैं।
करा चुके एक लाख हस्ताक्षर
हिंदी से न्याय अभियान के प्रदेश अध्यक्ष देवी सिंह नरवार ने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालय में हिंदी एवं भारतीय भाषाओं में कामकाज हो, इसके लिए आगरा में एक लाख लोगों से हस्ताक्षर करा चुका हूं। यह अभियान न्यायविद चंद्रशेखर पंडित भुवनेश्वर दयाल उपाध्याय के सफल नेतृत्व में 35 वर्षों से चल रहा। इसके लिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 348 में संशोधन किया जाएगा।
हिंदी पढ़ने वाले बढ़ रहे
केएमआई के डायरेक्ट प्रो. प्रदीप श्रीधर ने बताया कि हिंदी की जो दुर्दशा थी अब सुधर रही है। देश-विदेश में हिंदी को पढ़ने वाले छात्रों की संख्या बढ़ी है। तकनीकी क्षेत्र में भी हिंदी वालों की जरूरत पड़ रही है। अब हिंदी को राष्ट्रभाषा कर घोषित करने का समय आ गया है।
बंगाल में धीमा, तमिलनाडु में जोरदार प्रदर्शन
तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के आश्वासन के बाद वर्ष 1965 में तमिलनाडु में हिंदी को लेकर जोरदार प्रदर्शन हुआ। रेलवे स्टेशनों पर लगे पत्थरों पर लिखे हिंदी नामों को तारकोल से पोता गया। बाजारों में हिंदी में लिखे बोर्ड नष्ट कर दिए गए। मद्रास में बसें हिंदी भाषियों का घर से निकलना बंद हो गया था। तमिलनाडु में हिंदी लेखक डॉ. रमेश चौधरी आगिरपूड़ी का पुस्तकालय जला दिया गया था।
साहित्यकार थे क्षुब्ध
देश में हिंदी को राजभाषा स्वीकार होने के बाद विरोध प्रदर्शन से क्षुब्ध होकर साहित्यकार महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत, डॉ. वृंदावन लाल वर्मा आदि ने सरकार की ओर से प्रदत्त पद्मभूषण, पद्मश्री आदि उपाधियां लौटा दी थीं।