आगरा में छावनी क्षेत्र में कदम-कदम पर समस्याएं हैं। अस्पताल न ढंग के स्कूल हैं। नाले चोक हैं। पार्क बदहाल हैं। इससे 50 हजार आबादी समस्याओं से जूझ रही है।
उत्तर प्रदेश के आगरा में छावनी क्षेत्र की 50 हजार से ज्यादा आबादी को भी लोकसभा चुनाव से बड़ी उम्मीदें हैं। यहां जनता अनिश्चय की स्थिति में है। परिषद के चुनाव नहीं होने के कारण नुमाइंदगी करने वाला कोई नहीं है। कहीं नाला चोक है तो कहीं सड़कें जर्जर हैं। स्ट्रीट लाइटें खराब हैं। पार्क बदहाल हैं। नागरिक सुविधाओं का अभाव है। टैक्स का बोझ है।
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देशभर की छावनी में बदलाव की कवायद के बीच आगरा छावनी की जनता पशोपेश में है। नगर निगम में विलय का रास्ता बनेगा या छावनी का अस्तित्व बना रहेगा। छावनी में सरदार वल्लभभाई पटेल पार्क में झूले लगवाए गए मगर पार्किंग और प्रवेश शुल्क लगाने से लोग कम ही रुख करते हैं। अन्य पार्कों का भी यही हाल है।
सीवरेज सिस्टम नहीं होने के कारण गंदा पानी पार्क के टैंक में जमा होता है। वाटर एटीएम खराब पड़े हैं। आम जनता के लिए बनवाए गए शौचालय टूटे पड़े हैं। टक्कर रोड से नगर आयुक्त आवास की ओर जाने वाली सड़क जर्जर है। सुल्तानपुरा की सड़क का भी बुरा हाल है।
छावनी के चुनाव हों, अधिकार बढ़ें
छावनी परिषद के अधिकार बढ़ाए जाने चाहिए। निगम की तरह शक्तियां बढ़ेंगी तो नागरिकों की समस्याएं भी कम होंगी। या फिर छावनी को दयालबाग की तरह एक नगर पंचायत का दर्जा दिया जाए, ताकि छावनी की विधिधताओं को सहेजा जा सके।
नामनेर को सिविल एरिया में शामिल हुए बरसों गुजर गए मगर उन्हें आज भी रक्षा संपदा कार्यालय आना होता है। ऐसे में छावनी में फिर से चुनाव होना चाहिए। - डॉ. पंकज महेंद्रू, पूर्व उपाध्यक्ष, छावनी परिषद
दोयम दर्जे के नागरिक हैं छावनी के लोग
छावनी के निवासी आज भी दोयम दर्जे के नागरिक हैं। निर्माण कार्य और मरम्मत जैसे काम कराने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। 125 बंगले हैं। इन बंगलों में हजारों लोग निवास करते हैं। ऐसे में लोगों की दुश्वारियां कम नहीं हैं। छावनी के कानूनों को तरल करना समय की मांग है। - राजीव तिवारी, आगरा कैंटोनमेंट सिटीजंस एसोसिएशन
सिविल एरिया में हो विलय
छावनी के सिविल एरिया का विलय नगर निगम में होना चाहिए। इससे छावनी क्षेत्र के लोग अपनी जमीन की आसानी से रजिस्ट्री कर सकेंगे। छावनी के लोगों को बैंक बिना एनओसी के ऋण नहीं देते हैं मगर छावनी से एनओसी हासिल करना किसी युद्ध के जीतने से कम नहीं है। कई दशक से फ्री होल्ड के मामले लटके हैं। - रिंकू अग्रवाल, व्यापारी नेता
बिलों पर दी जाए छूट
नगर निगम की तरह ही छावनी की जनता को भी गृह व जलकर के बिलों में ओटीएस और ब्याज माफी जैसी योजनाएं लागू की जानी चाहिए। बकाया पर भी ब्याज माफ होना चाहिए, लेकिन छावनी प्रशासन कभी छूट नहीं देता है। - राजू अग्रवाल, सुल्तानपुरा, कैंट
यह हैं रोड़े
भवन निर्माण कराने के लिए अनुमति नहीं मिलती है। ऐसे में लोग गिरासू मकानों में रहते हैं।
मरम्मत के लिए भी छावनी कार्यालय के चक्कर लगाने होते हैं।
बंटवारा (म्युटेशन) छावनी का सबसे बड़ा रोड़ा है। तमाम तरह की तकनीकी दिक्कतों के कारण म्युटेशन की फाइलें लटकी रहती हैं।
व्यावसायिक गतिविधियां संचालित नहींं कर सकते हैं।
8 साल से नेतृत्व विहीन छावनी
छावनी परिषद में चुनाव को करीब आठ साल गुजर चुके हैं। इसमें आठ वार्डों में 50 हजार से ज्यादा की आबादी है। इनमें 20 हजार से ज्यादा वोटर हैं। इनमें सैन्य एरिया के वोटर शामिल नहीं है। आठ परिषद के सभासदों में से एक छावनी उपाध्यक्ष चुना जाता है। लेकिन चुनाव नहींं होने पर बैरीड बोर्ड के गठन का नियम है। इस बोर्ड में ब्रिगेडियर, सीईओ के अलावा एक जनता का प्रतिनिधि शामिल होता है। लेकिन इस बोर्ड का गठन भी नहीं हुआ है।
छावनी की आय कम, खर्च ज्यादा
छावनी परिषद हमेशा कर्ज में डूबी रहती है। आय के साधनों में गृह, जलकर, दुकानों का किराया, सरकारी कार्यालयों से किराया, एंट्री टैक्स आदि है, जबकि कर्मचारियोंं के वेतन, भत्ते और अन्य खर्च ज्यादा हैं। यही कारण है कि जनता पर टैक्स का बोझ कई गुना है।
छावनी में करोड़ों की लागत से अस्पताल का पुनर्निर्माण करवाया गया मगर अब इसका बुरा हाल है। एक चिकित्सक के भरोसे अस्पताल चल रहा है। करोड़ोंं के खर्च के बाद भी अस्पताल में इलाज नहीं मिल पा रहा है। स्टाफ की कमी है। निजी फर्म को ठेका दिया था, लेकिन वह गबन करके चली गई।