चंबल में अवैध खनन पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
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आगरा की चंबल सेंक्चुअरी में बालू के अवैध खनन को रोकने और पर्यावरण पर पड़ रहे असर के मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का अनुपालन नहीं हुआ है। चंबल सेंक्चुअरी से जुड़े तीनों राज्यों उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में मॉडल एसओपी तैयार हो सकी और न ही समान कार्ययोजना बनाई गई। वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट की ओर से चंबल नदी के ईको सिस्टम की रिपोर्ट भी नहीं सौंपी गई है। इसी तरह नेशनल हाईवे अथॉरिटी और पर्यावरण मंत्रालय ने सेंट्रल इंपावर्ड कमेटी को अनुपालन से जुड़ा कोई ब्योरा नहीं दिया है।
यह तथ्य सेंट्रल इंपावर्ड कमेटी ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट को सौंपी अपनी चौथी रिपोर्ट में रखे हैं। कमेटी के सदस्य सचिव डॉ. सतीश सी. गरकोटी की ओर से दाखिल की गई रिपोर्ट में 22 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन पर राज्य सरकारों और पर्यावरण मंत्रालय से जुड़े बिंदुओं पर ब्योरा पेश किया गया है। इस रिपोर्ट में सीईसी के सदस्य सचिव ने कहा है कि तीनों राज्यों ने अनुपालन की दिशा में कई ठोस कदम उठाए हैं, जिनमें अधिसूचनाओं का जारी करना, अंतिम रूप देना, नोडल अधिकारियों की नियुक्ति, प्रवर्तन टीमों का गठन और निगरानी शामिल है। हालांकि एनएचएआई और पर्यावरण मंत्रालय ने अनुपालन रिपोर्ट नहीं सौंपी है।
सीईसी ने सेंक्चुअरी में शामिल जमीन पर की है सिफारिश
सीईसी सदस्य सचिव ने स्पष्ट किया है कि उन्होंने केवल सेंक्चुअरी क्षेत्र की राजस्व भूमि को संरक्षित या आरक्षित वनों में परिवर्तित करने की सिफारिश की है। ग्राम भूमि या निजी भूमि को संरक्षित या आरक्षित वनों में परिवर्तित करने की सिफारिश नहीं की है। यह सिफारिश भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 52 के तहत वन विभाग की प्रवर्तन शक्तियों पर लगी सीमाओं को दूर करने के उद्देश्य से की गई है। यह अवैध रूप से खनन की गई रेत और उपकरणों को जब्त करने के संबंध में है।
अनुपालन पर सुनवाई आज
चंबल सेंक्चुअरी की सुरक्षा और वन क्षेत्र के संरक्षण से जुड़े मामले में अनुपालन पर सीईसी की इस रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को सुनवाई होगी।