भले ही गांधी जयंती पर देशवासी मोहनदास करमचंद गांधी को नमन कर रहे हैं, लेकिन उनके संदेशों को देश भूलता रहा है। स्वदेशी की पहचान और स्वतंत्रता आंदोलन में जान फूंकने वाली बापू की खादी को लोग भूलते जा रहे हैं।
नौजवान, युवा, बच्चे, महिलाएं खादी को भुलाकर रेडीमेड कपड़ों की खरीद में अधिक रुचि दिखा रहे हैं। यही कारण है कि खादी खरीदने वालों की संख्या में गिरावट दर्ज की जा रही है। खादी आश्रमों पर अब बिक्री नहीं होती है।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने देश भर में खादी की अलख जगाई थी लेकिन आधुनिक जीवन की दौड़ में अब लोग खादी को भूलते जा रहे हैं। खादी ग्रामोद्योग केंद्रों पर खादी से बने कुर्ता, पजामा, पेंट, शर्ट के कपड़ों के अलावा दरी, चादर, मेजपोश व अन्य कपड़ों की बिक्री की जाती है।