चुनावी नारे बिहारी के दोहों की तरह काम करते थे, देखन में छोटे लगैं, घाव करैं गंभीर। ब्रज में भी लगभग हर चुनाव में ऐसे नारे दिए गए हैं जो वोटर के सीधे दिल में उतर जाते हैं। हालांकि, अब राष्ट्रीय नारों का बोलबाला है लेकिन लंबे समय तक ब्रज के चुनाव में स्थानीय नारे ही छाए रहते थे।
मैनपुरी में 1957 के लोकसभा चुनाव में एक नारे ने कांग्रेस प्रत्याशी को धूल चटा दी थी। निवर्तमान सांसद और कांग्रेस प्रत्याशी बादशाह गुप्ता चुनाव चिह्न बैलों की जोड़ी के साथ मैदान में थे। भारतीय जनसंघ प्रत्याशी चुनाव चिह्न दीपक के लिए वोट मांग रहे थे।
प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी वंशीदास धनगर चुनाव चिह्न झोपड़ी के साथ मैदान में थे। प्रसपा की ओर से दिया गया नारा ‘कांग्रेस के बैल मरखने दीपक आग लगैया, मड़ैया मत भूल जइयो प्यारे वोटर भैया’ ने रातोंरात चुनाव बदल दिया और वंशीदास धनगर ने कांग्रेस प्रत्याशी को हराकर जीत हासिल की।
आगरा में 1977 में बीकेडी ने कांग्रेस के खिलाफ नारा दिया था, जाए आजादी मन जानै, खेती सरकारी बनवादऊंगी, तेरे गंज में गधा चरवादऊंगी। गंज का अर्थ क्षेत्र है।
ऐसे थे नारे
- 1957 में मैनपुरी में सोशलिस्ट पार्टी का नारा, कांग्रेस के बैल मरखने दीपक आग लगैया, मड़ैया मत भूल जइयो प्यारे वोटर भैया।
- 70 के दशक में स्वतंत्र पार्टी का नारा: हाथी कौ तौ पांव टूट गयो, बैल गचक गए गारे में, दीपक बुझ गयौ आरो में, वोट दे दिए सितारे में।
- 77 में कांग्रेस का बीकेडी के खिलाफ नारा: जाए आजादी मन जाने, खेती सरकारी बनवादऊंगी, तेरे गंज में गधा चरवादऊंगी।
- 77 में बीकेडी का कांग्रेस के खिलाफ नारा: जे तेरे खेत उजारेंगे, जे तेरेई घूरे भैंसा, गांव भैंस तोकू रहे न पीवे, खाइबे कौ तो न रहैगो दरिया।
- 80 के दशक में जनसंघ का जवाबी नारा: सुनो सुने भारत के भइया, कांग्रेस दीजो छोड़, वोट दीजो दीपक कू भइया।
- 80 के दशक में कांग्रेस का नारा: हैरई होड़ा होड़ी है, दैना निशान लगाय, बनी बैलों की जोड़ी है।
- 90 के दशक में मथुरा में भाजपा का नारा, कह दो सब डंके की चोट फूल कमल को देंगे वोट।
- 1996 में आगरा छावनी से उम्मीदवार रहे केशो मेहरा का नारा था, एक ही चेहरा, केशो मेहरा।