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आगरा: दलालों के फर्जीवाड़े की सजा भुगत रहे लोग, स्मार्ट कार्ड बनवाने पहुंचे तो हुआ यह खुलासा

Tue, 19 Jan 2021 01:53 PM IST
मुकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा

सार

  • आरटीओ (क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय) आगरा में 15 दिन में 20 लोगों के लाइसेंस जांच में फर्जी पाए गए हैं। यह लोग अपने नवीनीकरण या स्मार्ट कार्ड बनवाने के लिए आरटीओ पहुंचे थे। रिकॉर्ड रजिस्टर से चेक किया गया तो उन नंबरों पर दूसरे लोगों के लाइसेंस बने हुए थे। यह लाइसेंस 2005 से 2010 के बीच बनवाए गए थे।
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संभागीय परिवहन कार्यालय आगरा
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विस्तार
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आगरा के आरटीओ में पुराने ड्राइविंग लाइसेंस डायरी पर बनाए जाते थे। ऐसे लाइसेंस वैधता तारीख खत्म होने के बाद नवीनीकरण कराने या फिर इन्हें स्मार्ट कार्ड के रूप में तब्दील कराने के लिए पहुंचते हैं तो आवेदन के बाद ऐसे लाइसेंस की जांच की जाती है। 

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पिछले 15 दिन में आरटीओ में 20 ऐसे प्रकरण सामने आए, जिनके लाइसेंस का रिकॉर्ड ही रजिस्टर में दर्ज नहीं था। या फिर उस लाइसेंस के नंबर पर दूसरे व्यक्ति का लाइसेंस बना हुआ है। उसका फोटो और ब्यौरा भी दर्ज है।

आरटीओ के अधिकारियों ने बताया कि उस दौरान लाइसेंस का ब्यौरा ऑनलाइन नहीं था। ऐसे में दलाल फीस अपनी जेब में रखकर फर्जी मुहर और नंबर विभाग के लोगों से जानकारी करके चढ़ाकर बना देते थे। 2013 में स्मार्ट कार्ड बनने के बाद फर्जीवाड़ा थम सका। 
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आरटीओ में कई लाइसेंस ऐसे भी आ रहे हैं, जिनका रिकॉर्ड तो रजिस्टर में दर्ज है मगर रसीद बुक पर फीस नहीं जमा है। ऐसे आवेदकों को पुरानी फीस दोबारा जमा करानी होती है। इसको लेकर आवेदक का आरटीओकर्मियों से विवाद होता है कि बगैर फीस जमा कराए उसका लाइसेंस तब कैसे बन गया। 

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केस 1 
सीरियल नंबर पर चढ़ा था दूसरा लाइसेंस
ब्रज विहार के नवल कुमार का लाइसेंस वर्ष मई, 2006 में बनाया गया था। जब वह नवीनीकरण कराने पहुंचे तो सीरियल नंबर 13076 पर दूसरा लाइसेंस चढ़ा हुआ था।

केस 2
...भारी वाहन का लाइसेंस दर्ज

बेलनगंज के संजय शर्मा का लाइसेंस 31 जनवरी में खत्म होने वाला है। वह नवीनीकरण कराने के लिए पहुंचे तो रिकॉर्ड में उनके नंबर पर भारी वाहन का लाइसेंस दर्ज है। 

केस 3
कमला नगर के संजीव कुमार का लाइसेंस भी इसी तरह फर्जी निकला। उन्होंने 2005 में लाइसेंस बनवाया था, जो कि 2025 तक वैध था, लेकिन वह स्मार्ट कार्ड बनवाने पहुंचे थे। 
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प्राथमिकता से बनवाते हैं ऐसे लोगों का लाइसेंस 
एआरटीओ (प्रशासन) अनिल कुमार सिंह ने बताया कि वर्ष 2005 से 2010 के बीच के कई लाइसेंस ऐसे सामने आते हैं, जिनका रजिस्टर में ब्यौरा दूसरे लोगों के नाम का मिलता है। ऐसे में यह लाइसेंस फर्जी माने जाते हैं। रसीद बुक में भी उसी व्यक्ति के नाम से फीस कटी हुई होती है। ऐसे में हम लोगों को राहत देने की प्राथमिकता से लाइसेंस बनवा देते हैं। यह पुरानी गड़बड़ियां हैं, जिन्हें ठीक करने का प्रयास किया जा रहा है। 

28 कर्मचारियों के फर्जी लाइसेंस बने थे आगरा से 
एआरटीओ प्रशासन ने बताया कि आरटीओ आगरा से दिल्ली फायर सर्विस के कर्मचारियों ने लाइसेंस बनवाए थे। जब आगरा कार्यालय से जानकारी मांगी गई तो उनका रिकॉर्ड ही नहीं मिला। इसकी रिपोर्ट दी गई तो सभी को नौकरी से हटा दिया गया। जवानों का केस उच्चतम न्यायालय तक चला मगर अंत में उनकी नौकरी नहीं बची। इसी तरह डीटीसी के 18 चालकों के लाइसेंस भी आगरा से बनवाए गए थे। इन चालकों को भी बर्खास्त कर दिया गया था। 
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