इसे संयोग ही कहेंगे कि आगरा रेंज में यूपी पुलिस का निशाना या तो चूक जाता है या गोली किसी और को लग जाती है। बीते 2 साल में पुलिस की गोली से आगरा में एक भी बदमाश नहीं मरा है।
ये इत्तेफाक है या कुछ और कि पुलिस की गोली बदमाश को लगती है तो वह सिर्फ घायल होता है। गोली टांग पर लगती है। बेकसूर को लगती है तो उसकी जान चली जाती है।
दबिश के दौरान भी कई बार बवाल हो चुका है। पुलिस के अधिकारियों का कहना है कि इसकी वजह यह है कि पुलिस को प्रशिक्षित नहीं किया जा रहा है। कैसे दबिश देनी है, कैसे घेराबंदी की जानी है, इस पर ध्यान ही नहीं दिया जा रहा।
पुलिस में क्राइम ब्रांच का गठन किया गया तो इसमें सबसे अहम टीम स्वाट की बनी। स्पेशल वेपन एंड टेक्टिस ( स्वाट ) को खास हथियार दिए गए और ट्रेनिंग भी कराई गई। इसे काम दिया गया अपराधियों की सूचना पर घेराबंदी कर उन्हें पकड़ने का लेकिन यह टीम काम ही नहीं कर रही है।
ये हुईं पुलिस से चूक
चार महीने पहले मथुरा के ही विशंबरा में साहून गैंग के मुठभेड़ के दौरान पुलिस के गोली से बेकुसूर युवक की मौत हो गई थी। इसमें भी कोई कार्रवाई नहीं की गई। पुलिस ने जांच के नाम पर मामला रफा दफा कर दिया।
दो साल पहले मथुरा में पुलिस की गोली से फतेहपुर सीकरी के युवक रामू लोधी की मौत हो गई थी। काफी बवाल हुआ था। बाद में पुलिस ने किसी तरह जांच के बहाने मामला निपटा दिया। कोई कार्रवाई नहीं की गई। पुलिस ने रामू को बदमाश बताकर मार दिया था। उसके खिलाफ कोई केस दर्ज नहीं था।
ये मामले तो बानगी भर हैं। पुलिस के दामन पर खून के और भी छींटे हैं। जगदीशपुरा में हिस्ट्रीशीटर को घसीटकर ला रही थी पुलिस। उसकी मौत हो गई। पुलिसकर्मियों के खिलाफ केस दर्ज किया गया लेकिन कार्रवाई नहीं की गई।
10 जनवरी को धौलपुर में दबिश देने के लिए गई बसई जगनेर थाना पुलिस की गोली से युवक की मौत हो गई थी। इंस्पेक्टर समेत नौ पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या का केस दर्ज है। इनकी कभी भी गिरफ्तारी हो सकती है।
ढाई साल पहले एत्मादपुर में पुलिस ने एक युवक को हिरासत में लेने के दौरान उसकी पिटाई कर दी। पुलिस हिरासत में उसकी मौत हो गई। थाना पर भारी बवाल हुआ। केस दर्ज किया गया लेकिन बाद में मामला निपट गया, कोई कार्रवाई नहीं हुई।