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असमंजस बरकरार, प्रत्याशी बेकरार  

Sun, 08 Jan 2017 12:45 AM IST
असमंजस बरकरार, प्रत्याशी बेकरार  
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election - फोटो : demo pic
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‘साइकिल’ को लेकर सपा में फैली रार ने प्रत्याशियों को बेकरार कर दिया है। लखनऊ में लगातार चल रहीं बैठकों में उनकी उलझन का समाधान नहीं निकल पा रहा है। कभी गठबंधन की तो कभी नई सूची में नए नाम होने की चर्चा ने उनके प्रचार को थाम दिया है। वहीं, सबसे ज्यादा परेशान लोगों को वह सवाल कर रहा है जो हर जगह पूछा जा रहा है, आप किस गुट से हो।
विधानसभा को देखते हुए समाजवादी पार्टी ने सबसे पहले अपने प्रत्याशी घोषित कर दिए थे। मगर, पार्टी में मचे घमासान के बीच सब पिस कर रह गए हैं। सबकी निगाहें अब मुख्यमंत्री अखिलेश द्वारा जारी होने वाली सूची पर टिकी है। हालांकि उनके गुट के लोगों ने सोशल मीडिया के माध्यम से अपना पैनल उजागर कर दिया है। इससे पहले घोषित हो चुके प्रत्याशियों की मुश्किल और बढ़ गई है। इस पैनल की पुष्टि के लिए जब वह वरिष्ठ पदाधिकारी से संपर्क साध रहे हैं तो वे भी कुछ कहने की स्थिति में नहीं हैं। ऐसे में सपा का प्रचार रथ पूरी तरह से ठहर गया है। प्रत्याशी घर से नहीं निकल पा रहे, संगठन कलह खत्म होने का इंतजार कर रहा है।
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छावनी के मैदान में लड़े सबसे ज्यादा महारथी
आगरा। ताजनगरी के चुनावी महाभारत में सबसे रोचक मुकाबला छावनी सीट पर होता है। यहां चुनावी योद्धाओं की पूरी फौज जो उतर जाती है। 1993 में तो रिकार्ड ही बन गया था। दस-बीस नहीं, पूरे 77 उम्मीदवारों के बीच कुर्सी की जंग हुई थी। इससे पहले 1991 में भी प्रत्याशियों की संख्या हाफ सेंचुरी के पार गई थी।
कैंट विधानसभा सीट का गठन 1967 में हुआ था। तब 12 उम्मीदवार मैदान में उतरे थे। कांग्रेस के एचएचएनएएच बाबू पहले विधायक रहे। इसके बाद शुरू में दस से पंद्रह उम्मीदवार ही उतरे लेकिन राम लहर में तमाम रिकार्ड टूट गए। 1951 से 2012 तक के चुनाव में जनपद की नौ विधान सभा सीटों में सिर्फ दो ही बार ऐसा मौका आया है जब एक सीट पर 50 से ज्यादा उम्मीदवार उतरे हों। दोनों बार यह संयोग कैंट में रहा।
1993 में जब मुकाबला 77 उम्मीदवारों के बीच था, तब भाजपा के रमेश कांत लवानियां के हाथ जीत लगी थी। उन्होंने सपा के कृष्णवीर सिंह कौशल को हराया था। 77 उम्मीदवारों में 63 ऐसे थे जिन्हें 72 से कम वोट मिले थीं। छह के खाते में तो दस से भी कम वोट आए थे। इससे पहले जब 1991 में 53 प्रत्याशी थे, तब भाजपा के हरिद्वार दुबे जीते थे। अगले चुनाव यानी 1996 में यहां सिर्फ नौ उम्मीदवार रहे।

राम लहर में आई थी उम्मीदवारों की बाढ़
आगरा। 1991 और 1993 का दौर राम लहर का था। प्रदेश में धर्म के नाम पर वोटरों के ध्रुवीकरण की सियासत चल रही थी। उम्मीदवारों की संख्या भी इसी दौरान सबसे अधिक रही। 1993 में बाह में 17, फतेहाबाद, 27, एत्मादपुर में 29, दयालबाग में 26, कैंट में 77, आगरा ईस्ट में 47, वेस्ट में 28, खेरागढ़ में 28, फतेहपुर सीकरी में 19 उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतरे थे।

बाह में सबसे कम उतरे प्रत्याशी
छावनी के विपरीत बाह विधानसभा सीट पर सबसे कम प्रत्याशी मैदान में उतरते हैं। इमरजेंसी के बाद हुए 1977 के चुनाव में तो सिर्फ चार ही उम्मीदवार थे। इसके बाद 1980,1985, 1989 में नौ-नौ प्रत्याशी रहे और 91 और 96 में आठ-आठ। 2002 और 2007 में दस थे और 2012 में 13 के बीच हुआ मुकाबला।
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कैंट से ही जीत पाए मुस्लिम उम्मीदवार 
67 साल में दो मुस्लिम विधायक, दोनों छावनी से
आगरा। ताजनगरी के चुनावी इतिहास में 1951 से लेकर अभी तक  के 67 साल के सफर में सिर्फ दो ही मुस्लिम विधायक  चुने गए हैं। पहले चौधरी बशीर और दूसरे जुल्फकार अहमद भुट्टो। दोनों को ही छावनी की जनता ने चुना। दोनों ही बसपा के टिकट पर विधानसभा पहुंच पाए। दोनों ने ही भाजपा के केशो मेहरा को हराकर जीत हासिल की थी। बशीर जनपद के पहले मुस्लिम विधायक बने। चुनाव था 2002 का। उन्हें 32 हजार 182 वोट मिले। दूसरे नंबर पर रहे भाजपा के केशो मेहरा को 30 हजार 662 वोट मिले थे। तीसरे पर सपा के शिव कुमार रहे थे। उन्हें वोट मिले थे 17 हजार 136। चौथे नंबर पर कांग्रेस के शब्बीर अब्बास रहे। उन्हें 6384 वोट मिले थे। 2007 में बसपा के जुल्फकार अहमद भुट्टो जीते। उन्हें वोट मिले 30 हजार 524। उनसे हारे भाजपा के केशो मेहरा के हिस्से आए थे 27 हजार 149 वोट। सपा के टिकट पर लड़े बशीर 17 हजार 172 वोट के साथ तीसरे नंबर पर रहे। 
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