बीएचयू में धमाके बाद से सील की गई अस्पताल की पुरानी इमरजेंसी।
‘बाग’ हराभरा रखने को ताउम्र पसीने से सींचा। वक्त सुस्ताने का आया तो ‘लाल’ ने किनारे कर दिया। मजबूरी में इनका आसरा ओल्ड होम जरूर बने लेकिन अपनों की बेरुखी ने मानसिक रूप से बीमार बना दिया। नतीजतन, 80 फीसदी ‘बागवान’ जिंदगी को बोझ मानने लगे। एसएन मेडिकल कालेज के मानसिक रोग विभाग की स्टडी यही बताती है। डाक्टरों ने वृद्धाश्रम में रहने वाले 57 बुजुर्गों पर अध्ययन किया। 65 प्रतिशत अवसाद के शिकार हैं, वहीं तनाव-अनिद्रा जैसी समस्या आम हैं। इसके पीछे बड़ा कारण समाज और परिजनों की दूरी है। 70 फीसदी बुजुर्ग ऐसे थे, जिनसे कोई भी मिलने नहीं पहुंचता। डाक्टरों को पता चला कि महज 25-30 फीसदी से ही उनके परिजन ताल्लुकात रखते हैं। बेटी-दूर का रिश्तेदार या फिर हम उम्र परिचित मिलने भी आ जाते। इक्का-दुक्का ही ऐसे ‘खुशनसीब’ हैं, जिनके बेटे आएं। मानसिक रोग विभागाध्यक्ष डा. विशाल सिन्हा बताते हैं कि 75 फीसदी वृद्धों की आय का स्रोत नहीं। परिजन छूटे, समाज भी गया। सीमित लोगों से मिलना, इससे मानसिक बीमारियां बढ़ रही हैं।
बेस्ट पेपर का मिला अवार्ड
सुभारती मेडिकल कालेज, मेरठ में आठ मई को इंडियन जीरियाट्रिक मेंटल हेल्थ पर हुई कांफ्रेंस में एसएन मेडिकल कालेज ने नीड ऑफ एल्डर्ली ओल्ड एज होम एक्सपीरिएंस पर शोध पेपर प्रस्तुत किया गया। इसे बेस्ट पेपर का अवार्ड मिला। स्टडी करने वालों में डा. महबूब उल हसन अंसारी, डा. साथम मित्रा, डा. जीशान अनवर, डा. नरवीर यादव, डा. रमाशंकर मदेशिया रहे।
एकल वृद्ध ज्यादा निराश
- ओल्ड होम में 25 फीसदी ही दंपति हैं। 75 फीसदी एकल हैं। युगल के मुकाबले एकल बुजुर्ग ज्यादा निराश हैं। उनकी मानसिक दशा भी ज्यादा बदतर है।
ये तथ्य आए सामने:
80 फीसदी को सरकारी योजना का ज्ञान नहीं
70 फीसदी की शिक्षा प्राइमरी तक
15 फीसदी को परिवारी छोड़ गए
70 फीसदी मजबूरी में यहां रहने आए