गुलचमन अपने बच्चों के साथ और बकरे के चित्र का केक
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इस्लाम धर्म का दूसरा सबसे बड़ा त्योहार ईद-उल-अजहा यानि बकरीद इस साल 10 जुलाई रविवार के दिन मनाई जाएगी। ये त्योहार रमजान महीने के खत्म होने के 70 दिन बाद मनाया जाता है। इस दिन बकरे की कुर्बानी दी जाती है। लेकिन ताजनगरी आगरा में एक परिवार ऐसा है जिसका बकरीद पर कुर्बानी देने का अंदाज जुदा है। बेटी की सीख के बाद पिछले पांच साल से आजमपाड़ा के गुलचमन शेरवानी का परिवार केक पर बकरे का चित्र बनवाकर प्रतीकात्मक कुर्बानी देकर ईद मनाता है।
शाकाहारी हैं गुलचमन
शाहगंज के आजमपाड़ा निवासी गुलचमन शेरवानी ने बताया कि वह शाकाहारी हैं लेकिन परिवार में बकरीद पर बकरे की कुर्बानी हमेशा होती रही है। वर्ष 2018 में इसमें बदलाव आया। घर में पाले बकरे की कुर्बानी देनी थी। बकरे से बच्चों को बेहद लगाव था। इस बकरे को कुत्तों ने नोंच डाला था। घायल हालत में उसे लेकर आए थे। बच्चों ने उसकी एक साल तक देखभाल की थी।
बेटी की जिद से मिली बड़ी सीख
बेटी कुलसनम जिद पर अड़ गई कि वह इस बकरे की कुर्बानी नहीं दें। बेटे गुलवतन ने भी मना किया। उन्होंने बकरे को कुर्बानी के लिए मदरसे में देने का फैसला किया लेकिन बच्चे इस पर भी तैयार नहीं हुए। बच्चों की जिद के चलते उन्होंने उस साल केक पर बकरे का चित्र बनवाया और कुर्बानी दी। तब से यह सिलसिला चला आ रहा है।
दी जाती है प्रतीकात्मक कुर्बानी
गुलचमन ने बताया कि उनके परिवार में अब बकरे की प्रतीकात्मक कुर्बानी दी जाती है। उनका मानना है कि यह सबकी खुशी का मामला है। महज बकरे की कुर्बानी नहीं देने से उनके लिए बकरीद का महत्व कम नहीं हो जाता है।