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ब्रज संस्कृति के पुरोधा डा. बंसल ने वैश्विक पटल पर बढ़ाया हिंदी का मान

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कासगंज हिंदी हैं हम खबर से संबंधित फोटो डा. नरेश बंसल। फाइल फोटो - फोटो : KASGANJ
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कासगंज। जीवन पर्यंत हिंदी साहित्य की साधना में जुटे रहे ब्रज संस्कृति के पुरोधा डॉ. नरेश चंद्र बंसल ने हिंदी का मान वैश्विक पटल पर बढ़ाया और साहित्य को सम्मान दिलाया। उन्होंने गद्य ग्रंथ के साथ तमाम काव्य संग्रह की रचनाएं कीं। कई शोध किए। इन सबके लिए उन्हें सम्मानित किया गया।
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मूलरूप से कासगंज के रहने वाले डॉ. नरेश चंद्र बंसल का जन्म 1 जनवरी 1936 को हुआ था। उनके पिता बनवारी लाल और माता चमेली देवी के धार्मिक विचारों और संस्कारों का उन पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि वे बचपन से ही हिंदी की साधना में जुट गए। 1963 में डॉ. बंसल की नियुक्ति केए कॉलेज कासगंज में हिंदी विभागाध्यक्ष के पद पर हुई। वर्ष 1970 में आगरा विश्वविद्यालय से उन्होंने चैतन्य संप्रदाय और हिंदी साहित्य को देन विषय पर पीएचडी उपाधि ली।
वर्ष 1996 में वे हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हुए। बीमारी के कारण जून 2018 में उनका निधन हो गया। उनके जीवनकाल पर नजर दौड़ाएं तो तमाम उपलब्धियां हिंदी के क्षेत्र में उन्होंने हासिल कीं। वे हिंदी के साधक थे। बहुभाषाविद, संस्कृत के अनुरागी, ब्रज संस्कृति के पुरोधा थे। मथुरा, वृंदावन के पौराणिक स्थलों की धरोहरों को संभालने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। सूकरक्षेत्र शोध संस्थान की स्थापना भी डॉ. बंसल की ही देन है।
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डॉ. विद्युलता की जुबानी डॉ. बंसल की कहानी
श्रीमती शारदा देवी जौहरी कन्या महाविद्यालय की हिंदी की पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. विद्युतलता कुलश्रेष्ठ का कहना है कि डॉ. बंसल ने दो काव्य संग्रह की रचना की। ये थे मधुवृंदा और रजनीगंधा। दो गद्य ग्रंथ चैतन्य संप्रदाय- सिद्धांत और साहित्य एवं ब्रज संस्कृति एवं साहित्य लिखे। इनका प्रकाशन हुआ। लगभग 50 शोधार्थी डॉ. नरेश बंसल के निर्देशन में पीएचडी की उपाधि प्राप्त कर चुके हैं।
प्राचीन ग्रंथों, पांडुलिपियों एवं दस्तावेजों को खोजकर उन्होंने संग्रहित किया। ब्रज के प्राचीन कथा गीतों, लोक गीतों, संस्कार गीतों का संकलन ब्रज के प्राचीन मंदिरों की जानकारी, सूकरक्षेत्र के शिलालेखों और दस्तावेजों का उन्होंने संरक्षण किया। आगरा विश्वविद्यालय से एक शोध प्रबंध स्वीकृत हुआ है। जिसका नाम है डॉ. नरेश चंद्र बंसल व्यक्तित्व और कृतित्व। उन्हें इस विश्वविद्यालय से विद्या, वारिधि, साहित्यभूषण सहित तमाम रत्नों से सम्मानित किया गया।
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