आगरा के चर्चित पनवारी कांड में 32 साल बाद कोर्ट ने बृहस्पतिवार को अपना फैसला सुनाया। 1990 में पनवारी गांव में अनुसूचित जाति के परिवार की बेटी की बरात चढ़ाने को लेकर दंगा हुआ था। इस मामले में विशेष न्यायाधीश एमपी-एमएलए नीरज गौतम की कोर्ट में अभियोजन कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका। कोर्ट ने आरोपी भाजपा विधायक चौधरी बाबूलाल सहित आठ को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया।
घटनाक्रम 21 जून 1990 का है। सिकंदरा के गांव पनवारी निवासी चोखेलाल जाटव की बेटी मुंद्रा की शादी थी। सदर के नगला पद्मा से रामदीन की बरात आई थी। जाट समाज के लोगों ने बरात चढ़ाने का विरोध किया था। इस कारण बरात नहीं चढ़ सकी। दूसरे दिन पुलिस प्रशासन के अधिकारियों की मौजूदगी में बरात चढ़ाई जा रही थी। तब पांच-छह हजार लोगों की भीड़ ने बरात को चढ़ने से रोका था। पुलिस ने भीड़ को रोकने के लिए बल प्रयोग किया था। फायरिंग तक करनी पड़ी थी। गोली लगने से सोनी राम जाट की मृत्यु हो गई थी।
घटना के बाद गांव से लेकर शहर तक हिंसा भड़क गई थी। कर्फ्यू लगाया गया था। स्थिति को काबू करने के लिए पुलिस-पीएसी के साथ सेना भी लगी थी। विशेष न्यायाधीश (एमपी-एमएलए) नीरज गौतम ने बृहस्पतिवार को फैसला सुनाया। साक्ष्य के अभाव में संदेह का लाभ देते हुए आरोपी चौधरी बाबूलाल, मुन्नालाल, रामवीर सिंह, रूप सिंह, देवी सिंह, शिवराम, श्यामवीर, सत्यवीर को बरी कर दिया। उनके खिलाफ ठोस साक्ष्य नहीं मिल सके। कोर्ट में 21 गवाह पेश किए गए थे।
तत्कालीन निरीक्षक ने छह हजार अज्ञात के खिलाफ लिखाया था मुकदमा
पनवारी कांड में थाना सिकंदरा के तत्कालीन एसएचओ रमनलाल ने छह हजार अज्ञात लोगाें के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था। इसमें बलवा, जानलेवा हमला, तोड़फोड़, आगजनी, सरकारी कार्य में बाधा, एससी-एसटी एक्ट, सात अपराधिक कानून संशोधन अधिनियम लगा था। पुलिस ने केस मेें लंबी विवेचना की। इसके बाद 29 जनवरी 2000 को 18 आरोपियों के खिलाफ कोर्ट में आरोप पत्र दाखिल किया गया।