‘पापा, मैं भी बड़ा होकर आपका नाम करूंगी। बेटे की तरह आपके कंधे से कंधा मिलाकर चलूंगी। अगर, मैं बेटा नहीं तो इसमें मेरा क्या कसूर। मुझे अंगुली पकड़कर चलना सिखाया। अब आप ही अपने से दूर कर रहे हो।’ यह सात साल की मासूम की गुहार है, जिसे उसका बाप पहले ही घर से निकाल दी गई उसकी मां के पास छोड़ गया। मुश्किल यह कि मां भी उसे अधिवक्ता के पास छोड़ गई। अब उन्होंने इस बच्ची को उसका हक दिलाने के लिए संघर्ष करने का ऐलान किया है।
मामला सिकंदरा के एक कंप्यूटर व्यवसायी परिवार का है। सात साल पहले शादीशुदा और दो बेटियों के पिता व्यवसायी ने परिचित महिला के साथ दुष्कर्म किया। पीड़ित महिला की गुहार पर दोनों परिवारों के लोग बैठे। तय हुआ कि भले शादी न करे, व्यवसायी महिला को अपने दूसरे घर में पत्नी की तरह रखेगा। महिला ने जब दूसरी बेटी को जन्म दिया तो तीन साल पहले उसने उसे छोटी बेटी के साथ घर से निकाल दिया। महिला दिल्ली चली गई। बड़ी बेटी पिता के पास रही। एक माह पहले व्यवसायी इस बेटी को उसकी मां के घर छोड़ आया। महिला जब उसे यहां पहुंचाने आई तो उसने उन्हें घर में घुसने नहीं दिया। इस पर वह दीवानी में एक वकील से मिली और बेटी का हक दिलाने की गुहार की। शिकायत लिखी, फिर काम के बहाने बेटी को वहीं छोड़कर चली गई।
पराया सही, हक दिलाने का संकल्प
वकील ने पुलिस अधिकारी की मदद से बच्ची के पिता के बारे में पता किया। सिकंदरा पुलिस की मदद से उसके घर भी गए लेकिन उन लोगों ने बच्ची को रखने से इनकार कर दिया। अधिवक्ता ने बताया कि व्यवसायी परिवार से बात करने के बाद पुलिस उल्टा उन्हें बच्ची को उसकी मां के पास छोड़ आने को कहने लगी। तब उन्होंने फैसला लिया कि वह बच्ची का हक दिलवाकर रहेंगे। अधिवक्ता के मुताबिक, बच्ची को घर में तंग किया जाता था और उससे घर के काम कराए जाते थे।