काली कमाई के कुबेर कहे जा रहे यादव सिंह के पास नौकरियों का भी खजाना था। उसकी पहुंच इतनी ऊंची थी कि नोएडा विकास प्राधिकरण ही नहीं, कई महकमों के अफसर उसका हुक्म बजाते थे। नौकरी पाने के लिए उसकी सिफारिश की एक चिट्ठी ही बहुत थी। उसके एक फोन पर ठेके मिल जाते थे। उसके सीबीआई जांच में फंसते ही वे सभी लोग भी टेंशन में आ गए जिन्होंने उसकी सिफारिश से इसी तरह का कुछ न कुछ फायदा उठाया है।
इनमें आगरा और फीरोजाबाद के सैकड़ों लोग शामिल हैं। आगरा का वह रहने वाला है, जबकि फीरोजाबाद मेें उसकी ससुराल है। उसके परिवार के नजदीकी लोगों का कहना है कि 1980 में जेई भर्ती होने के बाद शुरू के कुछ साल तो उसने संघर्ष किया, लेकिन प्रमोशन पाकर एई बनने के बाद उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
नोएडा विकास प्राधिकरण में उसका सिक्का चलता था। उसने नेताओं और अफसरों को बड़े बड़े काम चुटकियों में किए। इसका नतीजा यह हुआ कि उसकी सिफारिश कई महकमों में चलने लगी। यह देखकर आगरा और फीरोजाबाद के बेरोजगार युवक उसके पास पहुंचने लगे। उसने सैकड़ों की सिफारिश की। किसी को प्राइवेट कंपनी में लगाया तो किसी को बिल्डर से कहकर काम दिलवाया। कई को प्राधिकरण में ठेके दिलवाए। इसके लिए कई बार तो नियम कायदे भी ताक पर रखे गए। उससे फायदा उठाने वाले अब टेंशन में बताए जा रहे हैं। उसके खिलाफ सीबीआई जांच का पता चलते ही उसके देवरी रोड स्थित आवास पर बड़ी संख्या में लोग पहुंचे।