ताजनगरी में भी सूर्योपासना के पर्व छठ धूमधाम से मनाया जाएगा। छठ पूजन की तैयारी जोरशोर से हो रही हैं। यमुना के प्रमुख घाटों की साफ-सफाई की जा रही है। नहाय खाय के साथ आज से छठ मैया का व्रत प्रारंभ हो जाएगा। घरों की सफाई और पूजा के लिए गेहूं तैयार किया जा रहा है।
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पूर्वांचल सांस्कृतिक सेवा समिति के अध्यक्ष शंभू चौबे ने बताया कि छठ पर्व की पूजा नि:संतान परिवार वाले संतान की प्राप्ति के लिए और संतान वाले लोग परिवार में सुख शांति और सभी की निरोगी काया के लिए रखते हैं। सूर्य पूजा का चार दिवसीय महोत्सव 11 नवंबर से प्रारंभ हो रहा है।
उन्होंने बताया कि सूर्य षष्ठ व्रत सुहागिन महिलाएं और पुरुष करते हैं। इसमें पंचमी से सप्तमी दिन का उपवास किया जाता है। पंचमी (खरना) के दिन शाम को बिना नमक वाला भोजन किया जाता है। अधिकतर लोग खीर का सेवन करते हैं। षष्ठी को पूरे दिन जल ग्रहण नहीं किया जाता।
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सूर्य को दिया जाएगा अर्घ्य
यमुना घाट
- फोटो : अमर उजाला
शाम के समय डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देकर फल, पकवान, पुष्प आदि सूर्य भगवान को अर्पित किए जाते हैं। निराहार और रात भर जागरण करने के बाद दूसरे दिन सूर्योदय के पूर्व नदी और सरोवर में स्नान करके उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
आगरा में छठ पूजन हर साल भव्य रूप लेती जा रहा है। इस बार छठ पर्व धूमधाम से मनाए जाने की तैयारी है। यमुना के घाटों पर छठ पूजन के लिए भीड़ उमड़ती है। नहाय-खाय पर व्रती महिलाएं चावल, चने की दाल, लौकी की सब्जी खाएंगी।
छठ पूजा का महत्व
छठ मैया का व्रत रोगों से मुक्ति पाने और संतान की सुख-समृद्धि में वृद्धि के लिए रखा जाता है। सच्चे मन से व्रत रखने पर मैया मनोकामना जरूर पूरी करती हैं। जिसकी मनोकामना पूरी होती है वह कोसी भरते हैं। बहुत से लोग दंडवत करते हुए घाटों पर पहुंचते हैं। व्रत रखने वालों की सेवा करने वालों को भी बहुत लाभ मिलता है।
कब, क्या होगा
11 नवंबर: (नहाय खाय) से व्रत प्रारंभ होगा। सूर्य उदय होने से पूर्व उठकर व्रती घर को पवित्र करेंगे। नये चूल्हे पर पीतल के या मिट्टी के पात्र में आम की लकड़ी जलाकर चने की दाल, चावल, लौकी सेंदा नमक डालकर पकाएंगे। खाना बनाते समय छठी मैया के गीत गाएं जाएंगे।
12 नवंबर : (खरना) इस दिन व्रती पूरे दिन निर्जला व्रत करेंगे। शाम को आठ बजे मिट्टी के बर्तन में पकाई गई गुड़ की खीर, शुद्ध गेहूं के आटे की रोटी और अन्य पूजन सामग्री के साथ छठी मैया की पूजा करेंगे। इसके बाद व्रती केले के पत्ते पर प्रसाद गृहण करेंगे।
13 नवंबर: (प्रथम अर्घ्य) इस दिन व्रतधारी महिलाएं और पुरुष निर्जल व्रत रखते हैं और शाम को अस्त होते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। रात में जागरण किया जाता है।
14 नवंबर: (द्वितीय अर्घ्य) इस दिन सुबह चार बजे व्रतधारी नदी, सरोवर पर उपस्थित होंगे और डलिया या सूप में पूजन सामग्री रखकर दीपक जलाकर जल में खड़े होकर सूर्य के उगने की प्रतीक्षा करेंगे और उगते हुए सूर्य को पीतल के लोटे से अर्घ्य देंगे। गाय के कच्चे दूध से भी अर्घ्य दिया जाता है। घाटों पर लोग मंगल गीत गाते हुए पहुंचते हैं। पूजन के बाद घाट पर प्रसाद वितरण होता है।
मान्यता है कि छठी व्रत का शुभारंभ रामायण काल से हुआ। इस व्रत को माता सीता ने अपने पुत्रों की दीर्घायु के लिए किया था। द्वापर में द्रोपदी ने व्रत किया था। द्रोपदी के छठ व्रत के परिणाम स्वरूप पांडवों को राजपाठ वापस मिला था। इस व्रत में भगवान सूर्य और उनकी पत्नी ऊषा को समर्पित है। इस व्रत को स्त्री और पुरुष दोनों ही कर सकते हैं।
आज नहाय खाय से प्रारंभ होगा पर्व
11 नवंबर को नहाय खाय से व्रत प्रारंभ होगा। सूर्य उदय होने से पूर्व उठकर व्रती घर को पवित्र करेंगे। नये चूल्हे पर पीतल के या मिट्टी के पात्र में आम की लकड़ी जलाकर चने की दाल, चावल, लौकी सेंदा नमक डालकर पकाएंगे। खाना बनाते समय छठी मैया के गीत गाए जाएंगे।
यमुना के घाटों की हुई सफाई
छठ व्रत में यमुना के घाटों पर मेले जैसा नजारा रहता है। व्रती अस्त होते सूर्य और उगते सूर्य को अर्घ्य देने आते हैं। बल्केश्वर, रामबाग घाट, दशहरा घाट और हाथी घाट पर बड़ी संख्या में लोग आते हैं।
घाटों पर पसरी गंदगी के चलते पूर्वांचल समाज के लोगों में आक्रोश था, लेकिन शनिवार को नगर निगम की टीम ने घाटों पर सर्फाई की निगम की टीम के साथ पूर्वांचल समाज के लोग भी बड़ी संख्या में घाटों पर पहुंचे और सफाई की।