संस्था प्रमुख मधु पंडित दास ने बताया कि चैतन्य महाप्रभु की पादुकाएं नवद्वीप स्थित धामेश्वर मंदिर में विराजमान रहती हैं। ये पादुकाएं संन्यास ग्रहण करने से पूर्व चैतन्य महाप्रभु ने अपनी पत्नी देवी विष्णुप्रिया को भेंट की थीं।
देवी विष्णुप्रिया ने जीवन भर इन पादुकाओं की सेवा की थी। चैतन्य महाप्रभु 504 वर्ष पहले वृंदावन आए थे। अब बांकेबिहारी की नगरी में उनकी पादुकाएं पहुंची हैं। चैतन्य महाप्रभु की चरण पादुकाएं 25 अक्टूबर की शाम को नवद्वीप पश्चिम बंगाल वापस लौट जाएंगी।
यह है चंद्रोदय मंदिर की खासियत
वृंदावन में बनने वाला चंद्रोदय मंदिर भगवान कृष्ण को समर्पित है। यह मंदिर कुतुब मीनार से भी तीन गुना उंचा होगा। इतना ही नहीं, इस मंदिर की नींव दुनिया की सबसे उंची इमारत बुर्ज खलीफा से भी तीन गुना गहरी होगी।
वृंदावन चन्द्रोदय मंदिर की ऊंचाई 700 फुट या 210 मीटर होगी। दिल्ली में 72.5 मीटर के कुतुब मीनार से इस इसकी ऊंचाई 3 गुना ज्यादा होगी, जिस के कारण पूर्ण होने पर, यह विश्व का सबसे ऊंचा धर्मालय बन जाएगा।
इसके गगनचुम्बी शिखर के अलावा इस मंदिर की दूसरी विशेष आकर्षण यह है की मंदिर परिसर में 26 एकड़ के भूभाग पर चारों ओर 12 कृत्रिम वन बनाए जाएंगे।
मंदिर के वन क्षेत्र को कुछ वैसा ही बनाने का प्रयास किया जाएगा जैसा विवरण कृष्ण साहित्य में मिलता है। पूरी तरह से तैयार होने के बाद यह मंदिर कृष्ण भक्तों की वृंदावन की कल्पना को पूरी तरह से साकार करेगा।
मंदिर की सबसे ऊंची मंजिला का नाम ब्रज मंडल दर्शन रखा गया है। यहां से ब्रज के 76 धार्मिक स्थानों और ताजमहल तक को दूरबीन से देखा जा सकेगा। पूरे मंदिर का भ्रमण करने में श्रद्धालुओं को तीन से चार दिन लगेंगे।
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