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करबन ने काली कर दी कालिंदी

Tue, 02 Feb 2016 02:18 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला आगरा
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यमुना को दिल्ली की अपेक्षा हाथरस के लोग ज्यादा नुकसान पहुंचा रहे हैं। करबन नदी के माध्यम से यमुना में बेतहाशा प्रदूषण घुल रहा है। इतना कि जलीय जीव-जंतुओं के जीवन पर संकट मंडराने लगा है। कैलाश घाट से ताजमहल तक पहुंचते-पहुंचते यमुना दम तोड़ रही है। बीच में करबन नदी का केमिकल युक्त पानी इसमें और ‘जहर’ घोल रहा है।
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28 जनवरी को अनुश्रवण समिति की बैठक में उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) ने पिछले साल के जो आंकड़े प्रस्तुत किए हैं, वे बेहद चौंकाने वाले हैं। रिपोर्ट के मुताबिक कैलाश घाट पर यमुना के पानी में 10 नवंबर 2015 को बायोकेमिकल आक्सीजन डिमांड (बीओडी) 12.5 मिग्रा/लीटर पाई गई। इसी समय वाटर वर्क्स पर बीओडी 15.5  मिग्रा/लीटर थी। करबन और यमुना के मिलने वाले स्थान समोगर पर बीओडी 13.5  मिग्रा/लीटर है। जिसकी वजह से इसी दिन ताज के आसपास बीओडी 26 मिग्रा/लीटर पहुंच गई थी। इससे जाहिर कि करबन नदी के मिलने के बाद यमुना ज्यादा दूषित हुई। बता दें कि बीओडी 10 मिग्रा/लीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए। ऐसा ही कुछ हाल आक्सीजन डिमांड (डीओ) का है। कैलाश घाट पर डीओ 6.7 मिग्रा/लीटर व ताज पर 4.5 मिग्रा/लीटर थी। करबन और यमुना के मिलने वाले स्थान पर डीओ 4.1 मिग्रा/लीटर थी। जोकि सबसे कम है। जबकि वाटर वर्क्स पर 6.1 मिग्रा/लीटर थी। यानी कैलाश से ताज के बीच शहर में तो यमुना दूषित हुई ही, उससे ज्यादा करबन नदी ने यमुना में ‘जहर’ घोला। बता दें डीओ 4 मिग्रा/लीटर से कम हो तो जलीय जीवजंतुओं का जीवन खतरे में पड़ जाता है। वर्तमान में करबन नदी की वजह से यमुना के जो हालात हैं, इसके पानी में डीओ कभी भी मानक से नीचे पहुंच सकता है। 26 दिसंबर, 2015 को कैलाश घाट पर बीओडी 10.5 मिग्रा/लीटर व ताज पर 28 मिग्रा/लीटर पाई गई। यहां भी मानक से लगभग तीन गुना बीओडी है। इधर, कैलाश पर डीओ 8 मिग्रा/लीटर व ताज पर 5.9 मिग्रा/लीटर निकला। इन आंकड़ों से साफ है कि नदी का पानी दिन प्रतिदिन दूषित होता जा रहा है।

यही पानी हो रहा सप्लाई
शहर में जल संस्थान इसी पानी को शोधन के बाद सप्लाई कर रहा है। यह पानी इतना दूषित है कि जल संस्थान को किसी-किसी दिन इसके शोधन में मानक से अधिक केमिकल प्रयोग करने पड़ रहे हैं। यह पानी काफी नुकसानदेह साबित हो सकता है।
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दर्जनों नील गायों ने तोड़ दिया था दम
वर्ष 2014 में करबन नदी का पानी पीने से दर्जनों नील गायों ने दम तोड़ दिया था। तब आनन-फानन में पानी की जांच कराई गई थी। इसमें पाया गया था कि हाथरस में रंग बनाने के दौरान प्रयोग होने वाला केमिकल युक्त पानी नदी में ही बहा दिया जाता है। यह दूषित पानी बाद में यमुना में आकर मिलता है।
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