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वसंत पंचमी 2021: इस बार बन रहा विशेष संयोग, विद्यार्थियों के लिए होगा फलदायक

Tue, 09 Feb 2021 07:30 PM IST
मुकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा

सार

  • वसंत पंचमी 16 फरवरी (मंगलवार) को है। इस दिन विशेष संयोग बन रहा है। यह पर्व ऋतुराज बसंत के आगमन का प्रतीक है। 
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सरस्वती पूजा
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विस्तार
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वसंत पंचमी के पर्व पर जौ व गेहूं की बालियां, टेशू के फूल मां शारदा को अर्पित कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। ज्योतिषाचार्य पंडित रामचंद्र शर्मा वैदिक ने बताया कि वसंत पंचमी आनन्दोत्सव है, इसके अधिष्ठाता प्रजापालक विष्णु और श्रीकृष्ण है। इसीलिए भगवान कृष्ण की लीलाभूमि ब्रज में वसंतोत्सव की प्रधानता है। 

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ज्योतिषाचार्य के अनुसार इस वर्ष मंगलवार के साथ अश्विनी नक्षत्र का संयोग अमृतसिद्धि महायोग व सिद्धि योग भी बन रहा है, जो विद्यार्थियों के लिए खास है। भौमाश्विनी योग का संयोग दुर्लभ है, जो रात्रि 10.55 बजे से दूसरे दिन सूर्योदय तक रहेगा। जो विद्यार्थी प्रतियोगी परीक्षाओं में भाग ले रहे हैं, उन्हें इस योग में मां की साधना से सरस्वती की कृपा प्राप्त होगी। 

ज्योतिषाचार्य ने बताया कि सृष्टि काल में आदि शक्ति ने अपने को पांच भागों में बांट लिया। वे राधा, पद्मा, सावित्री, दुर्गा और सरस्वती के रूप श्रीकृष्ण के विभिन्न अंगों से प्रकट हुई थीं। उस समय श्रीकृष्ण के कंठ से उत्पन्न देवी का नाम सरस्वती हुआ। यही कारण है कि सत्व गुण सम्पन्ना देवी सरस्वती का एक नाम वाणी भी है। इसीलिए मां सरस्वती का अधिकार वाणी पर माना जाता है, यह वहीं विराजमान होती हैं। 

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ज्योतिषाचार्य रामचंद्र शर्मा वैदिक - फोटो : अमर उजाला
रामचंद्र शर्मा वैदिक ने बताया कि वसंत पंचमी की मान्यता अबूझ मुहूर्त के रूप में है। लेकिन इस वर्ष वसंत पंचमी पर शुक्र का तारा अस्त होने से विवाह आदि शुभ कार्यों के मुहूर्त पंचांगकारों ने निर्धारित नहीं किए हैं। शुक्र व गुरु की विवाह आदि कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका है। शुक्र काम जीवन का महत्वपूर्ण कारक माना जाता है। शुक्र का तारा अस्त होने से विवाह आदि मंगल कार्य नहीं हो सकेंगे।

वसंत पंचमी को सरस्वती पूजन के साथ ही सरस्वती साधक वैदिक विद्वानों की पूजा का भी विधान है। वैदिक विद्वान वेदों के रक्षक हैं। वेदों को कंठ पर धारण किए हैं। इसलिए यह वेदों को धारण करने वाले वेदरक्षक वैदिक विद्वानों के सम्मान और सत्कार का  दिन है। इस दिन से ही वेदाध्ययन आरम्भ करने और विद्या अध्ययन की गुरुकुल परम्परा हमारे देश में आज भी प्रचलित है।
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