शहर की पेयजल समस्या से निदान के बैराज की मांग वर्षों से की जा रही है लेकिन बैराज यमुना के अपस्ट्रीम और डाउन स्ट्रीम के फेर में अटक गया है। एक बार शिलान्यास भी हो चुका है लेकिन बैराज अभी तक नहीं बन पाया है। पिछले दिनों मुख्यमंत्री की चंबल नदी से पानी लाने की घोषणा के बाद बैराज निर्माण पर असमंजस और गहरा गया है।
आगरा में यमुना नदी में ताजमहल से करीब 8 किलोमीटर पहले बैराज परियोजना को 1993 स्वीकृति की गई थी। केंद्रीय जल आयोग ने 134.80 करोड़ रुपये भी मंजूर कर दिए थे। तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने योजना का शिलान्यास भी कर दिया था। योजना की कुल लागत करीब 350 करोड़ रुपये तय की गई थी। इस योजना से करीब 120 क्यूसेक जल प्राप्ति अनुमानित थी। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने 2001 में अनुमति प्रदान कर दी थी। 15 करोड़ रुपये का प्रारंभिक भुगतान भी गया था लेकिन योजना अटक गई और पैसा वापस हो गया। आगरा बैराज यमुना के डाउन और अपस्ट्रीम के फेर में अटक कर रह गया।
बैराज बनने के लाभ
- जलापूर्ति से जलसंस्थान को कच्चा पानी मिल जाता
- भूगर्भ जल मीठा होता और गुणवत्ता में सुधार होता
- वायु में आर्द्रता बढ़ने से गर्मी का प्रकोप भी कम होता
- कृषि और उद्योगों को जल मिलने रोजगार भी बढ़ते
- यमुना नदी के स्मारकों के पीछे नौकायन की सुविधा होती
ताजमहल को सहेजने में होता लाभ
जानकारों को मुताबिक 350 साल से अधिक समय से यमुना के किनारे खड़े ताजमहल को सहेजने में बैराज कारगर होता। दरअसल, लकड़ी और कुओं पर बनी ताजमहल की नींव के लिए निरंतर पानी की जरूरत रहती है। वर्तमान में यमुना बरसात के मौसम के छोड़कर कम पानी होने के कारण ताजमहल भी प्रभावित हो सकता है।
क्यों अटक गया बैराज
बैराज की घोषणा अपस्ट्रीम में हुई थी। इसको लेकर विरोध शुरू हो गया। लोगों का कहना था कि अप स्ट्रीम बैराज से ताजमहल और अन्य स्मारकों को पास पानी कहां रहेगा। इससे तो अच्छा है कि डाउनस्ट्रीम में समोगर के आसपास बनाया जाए, जिससे पानी हमेशा ताजमहल के पास रहे लेकिन कुछ जानकारों का तर्क था कि बैराज से आगरा को कोई लाभ नहीं होने वाला है। यमुना नदी में दिल्ली के बाद पानी नहीं है। केवल इंडस्ट्रियल वेस्ट और सीवर का पानी आता है। यदि बैराज बना तो ताजमहल के पास इतनी सिल्ट जमा हो जाएगी ताजमहल को भी खतरा पैदा हो जाएगा। ऐसे पानी को रोकने से उसमें बदबू और सड़ांध की भी संभावना है।