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अगस्त क्रांति: नौ अगस्त के ही दिन आगरा में भड़की थी क्रांति की ज्वाला, चार माह चला था आंदोलन

Tue, 10 Aug 2021 12:02 AM IST
मुकेश कुमार न्यूज डेस्क अमर उजाला, आगरा

सार

कांग्रेस मुख्यालय से मिले तार के बाद ताजनगरी में आंदोलन की रूपरेखा तैयार हो गई थी। नौ अगस्त को पंडित श्रीकृष्ण दत्त पालीवाल (जिनके नाम से पालीवाल पार्क है) को अंग्रेजों ने सरकार के खिलाफ आवाज उठाने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था।
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अगस्त क्रांति - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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नौ अगस्त के ही दिन ताजनगरी में अगस्त क्रांति की ज्वाला भड़की थी। आंदोलन 27 अक्तूबर तक चला था। इन चार महीनों के दौरान तमाम लोगों की गिरफ्तारियां हुईं। कइयों को अंग्रेज अधिकारी जंगल में छोड़ आए। क्रांतिकारियों पर तरह-तरह के जुल्म ढाए गए लेकिन अंग्रेज अधिकारी उनके हौसले को नहीं तोड़ पाए। उस जमाने के कई दिग्गज कांग्रेसी नेताओं ने आगरा आकर गुपचुप बैठकें भी की थीं।

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कांग्रेस मुख्यालय से मिले तार के बाद ताजनगरी में आंदोलन की रूपरेखा तैयार हो गई थी। नौ अगस्त को पंडित श्रीकृष्ण दत्त पालीवाल (जिनके नाम से पालीवाल पार्क है) को अंग्रेजों ने सरकार के खिलाफ आवाज उठाने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था। उनके साथ ही पंडित जगन प्रसाद रावत को भी पुलिस ने जेल भेज दिया था। 

महात्मा गांधी के आह्वान पर ताजनगरी की गलियों में ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का नारा लगाने वाले प्रकाश नारायण शिरोमणी, राधेमोहन अग्रवाल, शांतिस्वरूप श्रीवास्तव, श्रीचंद दौनेरिया, पंडित कालीचरन तिवारी, गोपाल नारायण शिरोमणी, लक्ष्मी नारायण बंसल, पंडित बैजनाथ प्रसाद सहित तमाम क्रांतिकारियों की भी घेराबंदी कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था।

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शहर में हुईं थीं छिटपुट झड़पें
नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में जनता ने प्रदर्शन शुरू कर दिए। इतिहासकार बताते हैं कि नौ अगस्त को शहर में कई जगह युवाओं की पुलिस से छिटपुट झड़पें भी हुई थीं। इसका असर यह हुआ कि पुलिस को जहां भी युवाओं की भीड़ नजर आती, उन्हें सरकारी गाड़ी में बैठा कर जंगल में छोड़ आते थे। मकसद यह था कि अगर इन युवाओं को जेल भेजा जाएगा तो वे अन्य क्रांतिकारियों के साथ मिल जाएंगे। 

युवाओं के साथ अंग्रेजों का यह बर्ताव करीब एक महीने तक चला था। उस समय के कई दिग्गज कांग्रेसी आगरा आए थे। बेलनगंज, किनारी बाजार, रावतपाड़ा के कई मकानों में खुफिया बैठकों का दौर भी चला था। बाद में इसकी जानकारी अंग्रेजों को हो गई तो यह कांग्रेसी नेता अंडरग्राउंड हो गए।

...जब आंदोलन में कूद पड़ीं स्कूली छात्राएं
आंदोलन में हर वर्ग के लोगों ने योगदान दिया था। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रानी सरोज गौरिहार बताती हैं कि वे उस समय रावतपाड़ा की कन्या पाठशाला में पढ़ती थीं। नौ अगस्त को स्कूल परिसर में छात्राओं ने विरोध का बिगुल फूंक दिया था। कई छात्राएं मुख्य गेट पर खड़ी हो गई थीं। 

अन्य विद्यार्थियों को स्कूल के अंदर नहीं आने दिया जा रहा था। सिर्फ शिक्षिकाएं ही परिसर के अंदर जा रही थीं। उन्होंने बताया कि वह और आंदोलनरत कुछ छात्राएं परिसर के अंदर सीढ़ियों पर बैठ गई थीं। यह सीढ़ियां ऊपर की मंजिल की कक्षा में जाती थीं। वहां से भी छात्राओं को वापस लौटाया जा रहा था। ये सिलसिला कई दिनों तक चला।
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शहादत को करता हूं नमन
वयोवृद्ध क्रांतिकारी इमामुद्दीन कुरैशी ने कहा कि मेरी 105 बरस की उम्र हो गई है। फिर भी काफी बातें याद हैं। अंग्रेजों ने उस समय बहुत अत्याचार किए थे। किसी भी निर्दोष व्यक्ति को उसके घर से उठा ले जाते थे। मारपीट करते थे। हुकूमत की खिलाफत करने वालों को जेल में ठूंस देते थे। शहर में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए थे। पुलिस ने क्रांतिकारियों पर गोलियां तक चलाईं लेकिन वे हिम्मत नहीं हारे। देश की आजादी में अगस्त क्रांति का बहुत बड़ा योगदान है। उनकी शहादत को नमन करता हूं।

दस को हुआ था व्यापक प्रदर्शन
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के परिजन शशि शिरोमणि ने कहा कि आगरा में अगस्त क्रांति की ज्वाला नौ अगस्त को भड़की थी। दस तारीख को व्यापक प्रदर्शन हुआ था। निहत्थे क्रांतिकारियों को पुलिस ने पहले लाठी से पीटा और फिर गोलियां चलाईं। ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का नारा उस समय तमाम गली-मोहल्लों में गूंज रहा था।
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