हिंदी हैं हम: हिंदी भाषा के विशेषज्ञ डॉ. अशोक बंसल, डॉ. आनंद त्रिपाठी और डॉ. ललित मोहन शर्मा (क्रमश:)
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हिंदी का विस्तार एक संतुलन के साथ हो, यह आवश्यक है। हिंदी हमारी भाषा है, हमें इस पर गर्व होना चाहिए। हिंदी भाषा के विशेषज्ञों का कहना है कि हिंदी अब स्थानीय स्तर की भाषा ही नहीं रह गई, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी छा गई है। शनिवार को अमर उजाला से व्हाट्सएप पर हुए संवाद के दौरान लोगों ने अपनी बात रखी।
प्रवासी भारतीयों यूरोपीय देशों तक पहुंचाई हिंदी
राष्ट्र भाषा होने के बावजूद हिंदी के विकास का सवाल आजादी के बाद उठना शुरू हुआ था, जो आज भी बना हुआ है। यह बात अलग है कि हिंदी सिनेमा ने इस भाषा को लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाई है, लेकिन सरकारी कामकाज, व्यापार और शिक्षा में अंग्रेजी के वर्चस्व होने से हिंदी आज भी दोयम दर्जे की भाषा बनी हुई है। अनेक हिंदी विद्वान इसके शब्द भंडार को समृद्ध न कर इसकी शुद्धता को लेकर चिंतित रहते हैं। नतीजतन, शब्द भंडार की कमी के कारण लेखकों को अपनी अभिव्यक्ति के लिए अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग करना पड़ता है। ख़ुशी की बात यह है साहित्य और संस्कृति में रुचि रखने वाले प्रवासी भरतीय यूरोपीय देशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार में उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं। - डॉ. अशोक बंसल, सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर बीएसए कॉलेज
हिंदी को बाजारवाद के संकट से बचाना होगा
हिंदी को बाजारवाद के संकट से बचना होगा। हिंदी जगत व हिंदी प्रेमियों में आज एक प्रश्न जो सबसे ज्यादा उमड़ घुमड़ रहा है वो यह कि हिंदी का ज्यादा से ज्यादा विस्तार कैसे हो। एक रास्ता जो इनमें से ज्यादातर लोग समझ व देख पा रहे हैं वो है, बाजार, विज्ञापन, सिनेमा और टीवी। ये सामयिक सत्य है कि पिछले तीन से चार दशकों में इनके कारण हिंदी को विस्तार मिला है, किंतु मेरा निश्चित मानना है कि इससे हिंदी का कोई विकास नहीं हुआ। क्योंकि बाजारवाद के दबाव में फिल्में, विज्ञापन और अब सोशल मीडिया हिंदी के मूल और लालित्यपूर्ण स्वरूप के साथ जबरदस्त खिलवाड़ा कर रहे हैं। आश्चर्य ये है कि इस पर ज्यादातर हिंदी सेवी मौन हैं।- डॉ. आनंद त्रिपाठी, विभागाध्यक्ष, पत्रकारिता, बीएसए कॉलेज।
हिंदी को समृद्ध बनाने में ब्रजभाषा का योगदान महत्वपूर्ण
भारत की राष्ट्रीय भाषा के रूप में प्रतिष्ठित हिंदी की महत्ता आज विस्तृत फलक पर है। इसे समृद्ध बनाने में ब्रजभाषा का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। वृंदावन शोध संस्थान हिंदी के इस महत्व को दर्शाने वाले महत्वपूर्ण पक्षों पर बहुविधि कार्य कर रहा है। नई पीढ़ी इसकी गौरवशाली परंपराओं को समझे, उन्हें आत्मसात करे, इस उद्देश्य के साथ हमें आगे बढ़ना होगा।- डॉ. राजेश शर्मा, प्रकाशन अधिकारी वृंदावन शोध संस्थान, वृंदावन
भाषा ही संस्कृति का आधार
भावों, विचारों आदि की संप्रेषणता भाषा के बिना असंभव है। भाषा ही संस्कृति का आधार है, जिसके माध्यम से संस्कृति संग्रह संप्रेषणता व संवर्धनता को प्राप्त होती है। हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है, जो लगभग 10वीं शताब्दी से भारतीय जनमानस के विचारों को भावनाओं को चेतना को गतिशीलता प्रदान करती आ रही है। हिंदी की विशेषता है उसमें अन्य भाषाओं को आत्मसात करने की क्षमता है, इसलिए हम हिंदी को सर्वाधिक संवर्धित भाषा का दर्जा भी प्रदान कर सकते हैं। यूं तो दुनिया का कोई देश भारत की भाषाई विविधता की बराबरी नहीं कर सकता, लेकिन उत्तर उत्तर पश्चिम भारत में हिंदी भाषा का अपना प्रभावशाली स्थान है।- डॉ. ललित मोहन शर्मा, एसोसिएट प्रोफेसर शिक्षा संकाय आरबीएस कॉलेज आगरा