आजादी के बाद नए भारत ने नई उम्मीदें जगाईं, नए लक्ष्य तय किए। अमर उजाला की नींव जब 18 अप्रैल 1948 को पड़ी तो उसी साल आगरा ने दुनिया के बाजार में अपना पहला कदम रखा। यह कदम था आगरा के लेदर से बने जूते का, जिसे पहली बार वासन शू फैक्टरी ने निर्यात किया था। तब से अब तक अपने जज्बे, जुनून और हुनर के बल पर आगरा के जूते ने ऐसे चाल चली कि 75 से ज्यादा देशों में आगरा का जूता शान का प्रतीक बन गया। देश से निर्यात होने वाले जूतों में एक चौथाई से ज्यादा हिस्सेदारी आगरा की है, जबकि घरेलू जूता बाजार में दो तिहाई हिस्सा आगरा में बने जूतों का है। चार लाख लोग जूता कारोबार से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं, जबकि 5 हजार करोड़ रुपये का निर्यात और 10 हजार करोड़ का घरेलू कारोबार आगरा में जूतों से जुड़ा हुआ है।
कोरोना के कठिन समय भी भरी छलांग
दो साल पहले दुनिया में जब कोरोना संक्रमण ने हाहाकार मचा दिया और उद्योग पर ताले लग गए, पर इस उद्योग से जुड़े लोगों ने हिम्मत नहीं हारी और अपनी मेहनत के दम पर एक साल तक लगातार गिरावट के बाद बाजार को फिर उसी पायदान पर पहुंचा दिया, जहां वह कोरोना संक्रमण से पहले था। आगरा का जूता निर्यात 2019 के स्तर पर आ गया और 12 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इस दौरान चीन से कारोबार समेट कर आई जर्मन कंपनी ने आगरा का रुख किया और यहां उत्पादन शुरू कर दिया।
दुनिया के सर्वश्रेष्ठ ब्रांड बन रहे आगरा में
ताजनगरी का जूता दुनिया भर में चमक रहा है। उद्यमियों ने अपने दम पर जूता कारोबार को सालाना 15 हजार करोड़ टर्नओवर तक पहुंचा दिया है। करीब 4 लाख लोगों को इससे रोजगार मिल रहा है। कच्चे माल के लिए पहले काफी हद तक चीन पर निर्भरता थी, लेकिन अब उद्यमियों ने विकल्प तलाश लिए हैं। चेन्नई, कानपुर, नोएडा, आगरा, दिल्ली एनसीआर फुटवियर के बड़े सेंटर बन गए। इनमें आगरा लेदर फुटवियर में अव्वल है, जहां दुनिया भर के सभी बड़े ब्रांड्स बनाए जा रहे हैं। अमेरिकी और यूरोपीय बाजारों में जिन बड़े ब्रांड्स के शोरूम हैं, वह आगरा में जूता बनवाकर अपनी मुहर लगवा रहे हैं। यहां तक कि उनके पैकिंग वाले डिब्बे भी आगरा में ही बन रहे हैं।
चीन से पलायन कर रही हैं कंपनियां
कोरोना के कारण दुनिया भर के बाजारों में चीन के प्रति अच्छी भावना नहीं है। भारतीय जूता अपनी क्वालिटी और डिजाइन के कारण जगह बना रहा है। अमेरिकी और यूरोपियन बाजार के साथ नए बाजारों को पसंद आ रहा है। कंपोनेंट सेक्टर को प्रोत्साहन मिले तो हम जूता उत्पादन में आत्मनिर्भर हेा जाएंगे और किसी से माल आयात नहीं करना होगा। इससे हमारे जूतों की लागत भी घटेगी।
पूरन डावर, अध्यक्ष एफमेक
सरकार का साथ चाहिए
जूता उद्योग को और बेहतर करने के लिए सरकार का साथ चाहिए। हमारे पास परंपरागत हुनर है। हाथ का काम यहां अनूठा है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चल रहा है। रिसर्च एंड डेवलपमेंट तथा गुणवत्ता के कारण बहुराष्ट्रीय कंपनियां आकर्षित हो रही है। आगरा के जूते में क्वालिटी है, इसलिए उसे बाजार में पसंद किया जाता है। -गोपाल गुप्ता, उपाध्यक्ष एफमैक।
कम ब्याज दर पर मिले ऋण
पूरे वैश्विक बाजार पर छाने के लिए वैसा ही इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने की आवश्यकता है, जैसा चीन ने बनाया है। इसके तहत सस्ती ब्याज दर पर ऋण दिलाया जाए। घरेलू जूता दस्तकारों को ट्रेनिंग देने और निर्यातकों जैसी सुविधाएं देने से हम भी आगे बढ़ेंगे। घरेलू और निर्यातक दोनों मिल जाएं तो चीन से आगे बढ़ सकते हैं।
धर्मेंद्र सोनी, अध्यक्ष जूता कामगार संघ
चीन से मोहभंग हो गया
पिछले दो दशक से चीन का भारतीय बाजार पर दखल है। आगरा में भी कच्चा माल चीन से आ रहा था, मगर, अब सब स्वदेशी कच्चा माल चाह रहे है। इस उत्साह को और बढ़ाते हुए अपने उत्पाद, मशीन और रॉ मैटेरियल पर काम करना है - जितेंद्र त्रिलोकानी, उद्यमी
आगरा के जूता कारोबार पर एक नजर
185 निर्यात इकाइयां हैं आगरा में
5000 करोड़ का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष निर्यात
8000 घरेलू कारखाने
10000 करोड़ का टर्नओवर
65 फीसदी घरेलू बाजार में होती है जूते की आपूर्ति।
27 फीसदी निर्यात में हिस्सेदारी