शहर के बीच गोकुलपुरा की घनी बल्का बस्ती में बना लाल पत्थर का पक्का तालाब बेरुखी का शिकार है। लोग इस तालाब को ताल मंगलेश्वर नाम से जानते हैं। यहां पूर्व में लगाई गईं बेंच टूट गई हैं। तालाब सूखा पड़ा है। परिसर में गंदगी रहती है। सूने पड़े मेहराबदार दरवाजे, दीवारों पर बनीं धार्मिक आकृतियां, चारों कोनों पर खड़ी बुर्जियों को यहां रौनक लौटने का इंतजार है।
क्षेत्रीय निवासी 80 वर्षीय श्रीलाल यादव ने बताया कि वर्ष 2004 में आखिरी बार इस तालाब के संरक्षण के प्रयास हुए थे। तत्कालीन सांसद राज बब्बर के सहयोग से तालाब की दीवारों पर लोहे की ग्रिल लगाई गई थीं। मरम्मत कराई, जो पत्थर उखड़ गए थे उन्हें जोड़ा गया था। बेंच पड़ी थीं।
सिविल सोसायटी सदस्य दिवाकर तिवारी ने बताया कि ताल मंगलेश्वर के पास पहले अखाड़ा होता था। पहलवानी करने के बाद लोग इस तालाब में स्नान करते थे। तालाब में मछलियां थीं, जो तालाब की गंदगी को खा जाती थीं। ताल साफ रहता था। अब भी यहां प्राचीन गणगौर पूजन होता है। झूलन एकादशी पर महिलाएं अपने आराध्य को झुलाती हैं। इस तालाब की जो रंगत थी वो लौटनी चाहिए।
तालाब के पास नाथ संप्रदाय का प्राचीन मंदिर मंगलेश्वर नाथ स्थित है। जहां नियमित पूजा-पाठ होता है। गोरखपुर पीठ से संबंधित इस मंदिर का प्रबंधन कानों में कुंडल पहनने वाले योगियों के हाथों में है। लोगों की मान्यता है कि क्षेत्र में बल्का बस्ती नाम से मोहल्ला बाबा बालकनाथ के नाम पर बसी है।