मशहूर कवि-गजलकार आलोक श्रीवास्तव अपने शो ‘आलोकनामा : सपनों का सफर’ के जरिए युवाओं को संघर्ष से सफलता की प्रेरणा दे रहे हैं। उन्होंने ताजमहल को भारतीय गौरव और मजदूरों के हुनर की पहचान बताते हुए कहा कि सपनों के पीछे जितनी शिद्दत से दौड़ेंगे, वे उतनी ही जल्दी सच होंगे।
अपनी कविता और गजलों को महबूब की जुल्फों से निकालकर आम आदमी के पसीने और संघर्ष तक पहुंचा दिया। उनका शो ‘आलोकनामा : सपनों का सफर’ युवाओं में एक नई ऊर्जा भर रहा है। वे छोटी-छोटी प्रेरक और सच्ची कहानियां सुनाकर युवाओं को संघर्ष से सफलता की राह दिखा रहे हैं। हम बात कर रहे हैं मशहूर कवि, गजलकार, साहित्यकार और पत्रकार आलोक श्रीवास्तव की। उन्होंने ताजमहल, वर्तमान परिवेश और अपने शो ‘आलोकनामा : सपनों का सफर’ के बारे में अमर उजाला से बातचीत करते हुए खुलकर विचार रखे। आगरा में स्पाइसी शुगर्स की ओर से उनके शो का हाल ही में आयोजन किया जा चुका है।
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आलोक कहते हैं, मोहब्बत की बेमिसाल निशानी ताजमहल पर इन दिनों खूब विवाद चल रहा है लेकिन हम उस परंपरा के वाहक हैं जहां भगवान श्रीकृष्ण को जन्म देने वाली मां देवकी से अधिक, लालन-पालन करने वाली मां यशोदा के नाम से पुकारा गया। ताजमहल किसने, किसके लिए, कब, क्यों और कैसे बनवाया जैसे प्रश्नों से परे सच्चाई यह है कि यह कल भी हमारा था और आज भी दुनिया में हमारे भारतीय गौरव और हजारों मजदूरों के हुनर की अद्भुत पहचान है।
वह कहते हैं कि...
उजली उजली देह पर नक्काशी का काम,
ताजमहल की खूबियां मजदूरों के नाम।
अपने शो ‘आलोकनामा-सपनों का सफर’ के माध्यम से वह इन दिनों युवाओं को प्रेरित कर रहे हैं। उनका कहना है कि जिंदगी में हम जिस चीज के पीछे जितनी शिद्दत से भागते हैं, वह हमसे उतनी ही दूर हो जाती है, पर सपनों के साथ ऐसा नहीं है। सपनों के पीछे हम जितनी शिद्दत से दौड़ते हैं, सपने उतनी जल्दी सच होते हैं।
अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि सफलता के साथ तो सब होते हैं लेकिन असफलता का साथी कोई नहीं होता। 1994 की एक घटना का जिक्र करते हुए बोले- मैं जब पहली बार जगजीत सिंह से मिला तो उन्होंने स्टूडियो से लगभग भगा दिया था। मैंने उन्हीं से पूछा कि आखिर मुझे क्या करना चाहिए कि एक दिन द ग्रेट जगजीत सिंह मेरी गजलें गाएं। तब उन्होंने जो बात कही उसने मेरी जिंदगी बदल दी। उन्होंने कहा कि तुम आज तैयार नहीं हो तो यह बिल्कुल जरूरी नहीं कि तुम कल भी किसी लायक नहीं रहोगे। इसके बाद मैंने जी-तोड़ मेहनत की और नतीजा आपके सामने है। जगजीत सिंह से लेकर पंकज उधास और हरिहरन तक कितने बड़े फनकारों ने मेरी गजलों और गीतों को अपनी आवाज दी।
आलोक को हिंदी साहित्य के शिखर पुरुष डॉ. नामवर सिंह ने दुष्यंत की परंपरा का आलोक कहा था क्योंकि उनकी गजलों और कविताओं में आम आदमी का संघर्ष और समाज का आईना नजर आता है। आलोक कहते हैं कि सफलता रातों-रात नहीं मिलती, बल्कि यह एक लंबी यात्रा है। उनके शो में केवल कविताएं नहीं होतीं, बल्कि सच्ची घटनाएं और प्रेरक किस्से भी होते हैं जो युवाओं को यह एहसास कराते हैं कि हर बड़े सपने की नींव मेहनत के पसीने से सींची जाती है।
इस शो में अपनी पहली कविता वे कुछ यूं सुनाते हैं जो उन्होंने अपने जुनून पर लिखी थी...
जब भी तकदीर का हल्का सा इशारा होगा,
आसमां पर कहीं मेरा भी सितारा होगा।
एक दिन सब मेरे लफ्जों से उजाला लेंगे,
मेरी मुट्ठी में नई सुबह का तारा होगा।