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अहोई अष्टमी: संतान प्राप्ति के लिए इस कुंड में लगाते हैं डुबकी, जानिए पूरा इतिहास

Mon, 21 Oct 2019 12:32 PM IST
Abhishek Saxena न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा
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राधाकुंड - फोटो : अमर उजाला
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अहोई अष्टमी पर राधाकुंड में स्नान क रने के लिए भक्तों की भीड़ रविवार रात को ही राधाकुंड मेले में पहुंच गई। मान्यता के अनुसार भक्तों ने रात 12 बजे राधाकुंड-श्याम कुंड के संगम स्थल पर स्नान किया और चंद्र दर्शन कर पेठे का फल कुंड के जल में प्रवाहित किया।
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स्नान करने वालों में संतान प्राप्ति की चाह रखने वाले दंपती की संख्या अधिक थी। ऐसा माना जाता है कि इस अष्टमी पर कुंड में स्नान करने से संतान सुख मिलता है। उधर, कुंड, मंदिर और मठों में विवाहित जोड़े पूजा-अर्चना करते दिखे।

अहोई अष्टमी पर मध्य रात महिलाओं ने अहोई देवी की पूजा कर व्रत शुरू किया। परंपरा के तहत कुंड में स्नान कर पूजा की गई। सेवायत पंडित नंदकिशोर गोस्वामी ने बताया कि इस खास दिन पर कुंड में स्नान के लिए मणिपुर, बंगाल, महाराष्ट्र, पंजाब, दिल्ली, राजस्थान आदि से हर साल कई दंपती आते हैं।
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पद्मश्री गो भक्त सुदेवी दासी ने कहा कि राधाकुंड आने पर उन्हें गो भक्ति का अलौकिक आनंद एवं गोलोक धाम का वास मिला है। उधर, इस्कॉन के पांच हजार भक्त राधा रानी की शरण में हरे कृष्ण हरे राम... संकीर्तन से क्षेत्र को गुंजायमान करते रहे।

रात 12 बजे चंद्रमा के दर्शन कर श्रद्धालुओं ने राधारानी के जयकारे लगाए और राधाकुंड श्यामकुंड में स्नान कर संतान प्राप्ति के लिए पेठे का फल कुंड में दान कर डुबकी लगाई।
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यह है अहोई अष्टमी मेले का इतिहास
अहोई अष्टमी के लिए राधाकुंड-श्याम कुंड का अपना धार्मिक महत्व है। कहा जाता है कि इसे अरिष्टासुर का नगर व अरीठ वन के नाम से जाना जाता था। अरिष्टासुर नाम का राक्षस अति शक्तिशाली था।

शेर से भी तेज उसकी दहाड़ से आसपास के क्षेत्र में रहने वाली गर्भवती महिलाओं के गर्भ गिर जाते थे। इसी अरिष्टासुर राक्षस ने राजा कंस के कहने पर गाय के बछड़े का रूप धारण कर योगीराज श्रीकृष्ण पर आक्रमण किया था।

कृष्ण के हाथों बछड़े के रूप में आए राक्षस का वध होने पर उन पर गो हत्या का पाप लगा। मान्यता है कि इसकी मुक्ति के लिए श्रीकृष्ण ने दिवाली से आठ दिन पहले अहोई अष्टमी की रात को राधाकुंड-श्यामकुंड का निर्माण किया। कहते हैं कि इन दोनों कुंडो का रंग भी अलग-अलग है।
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