भगवान राम और हनुमान की प्रतिमाएं पाकिस्तान के जिस कटासराज मंदिर से गायब हुई, उस मंदिर परिसर को आगरा के पत्थरों से सहेजा गया है।
आगरा के तांतपुर और बंशी पहाड़पुर के लाल बलुआ पत्थर (रेड सैंड स्टोन) लाहौर के किला और कटासराज मंदिर में लगे पत्थरों से मिलते-जुलते हैं। पाकिस्तानी पुरातत्व विभाग ने कटासराज के सात मंदिरों का संरक्षण आगरा से भेजे गए पत्थरों से किया है।
कटासराज मंदिर में पूर्व उपप्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी की यात्रा के बाद सांस्कृतिक आदान-प्रदान के तहत पाकिस्तानी संस्कृति मंत्रालय ने पुरातत्व विभाग के महानिदेशक समेत प्रतिनिधिमंडल ताजमहल भेजा था।
कटासराज मंदिर
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तत्कालीन पाकिस्तानी पुरातत्वविद मो. अब्दुल खान और मो. कुरैशी ने रेड सैंड स्टोन से संरक्षण को देखा था, उसके बाद ही कटासराज मंदिर शृंखला के मंदिरों के संरक्षण के लिए आगरा से रेड सैंड स्टोन भेजा गया था। इसी पत्थर को लाहौर किला में संरक्षण के लिए प्रयोग किया गया है।
पाकिस्तानी पुरातत्वविदों ने करीब 300 ट्रक रेड सैंड स्टोन संरक्षण के लिए मांगा था। 1883 में जॉन मूरे ने अपनी हैंडबुक में कटासराज मंदिरों में रेड सैंड स्टोन का प्रयोग और ब्रिटिश अधिकारी कनिंघम द्वारा कराए गए कार्यों, धार्मिक मान्यताओं तथा कटासराज परिसर की हर इमारत का ब्योरा पेश किया है।
पुष्कर और कटासराज में गिरे भगवान शिव के आंसू
lord shiva
मान्यता है कि माता सती के हवन कुंड में कूदने के बाद भगवान शिव की आंखों से दो आंसू टपके, इनमें से एक आंसू कटासराज में टपका तो दूसरा अजमेर के पास पुष्कर में।
यही आंसू सरोवर बन गया, जो कटासराज मंदिर परिसर के पास 150 फुट लंबा और 19 फुट गहरा है। वहीं दूसरी मान्यता यह है कि महाभारत काल में युधिष्ठिर और यक्ष के बीच प्रश्न-उत्तर इसी सरोवर में हुए थे। 650-950 ई. के बीच कटासराज मंदिरों का निर्माण काल माना जाता है।