आगरा की डा. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के रसायन विज्ञान विभाग में ‘प्री-टर्म डिलीवरी’ पर शोध कार्य चल रहा है। इसमें देखा जा रहा है कि प्री-टर्म डिलीवरी (जो बच्चे समय से पहले पैदा हो रहे हैं) के लिए प्रदूषण कितना जिम्मेदार है।
90 महिलाओं के प्लेसेंटा का सैंपल लेकर जांच की गई। सभी में प्रदूषण का असर ज्यादा पाया गया। 65 फीसदी ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएं हैं। यह उपले से खाना पकाती हैं। शोध में पाया गया कि उपले के धुएं के कारण इनकी डिलीवरी समय पूर्व हो गई। दूसरा कारण कीटनाशक भी पाया गया है।
विभाग के अध्यक्ष प्रो. अजय तनेजा के मार्गदर्शन में डा. मधु आनंद, प्रियंका अग्रवाल और लक्ष्मी सिंह शोध कार्य कर रही हैं। कीटनाशक, पोलिसाइक्लिक एयरोमेटिक हाइड्रोकार्बन्स और मेटल्स (कॉपर, जिंक, निकिल, कैडमियम आदि) के असर को देखा रहा है।
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- फोटो : अमर उजाला
डा. मधु आनंद के मुताबिक वह कीटनाशक पर काम कर रही हैं। सभी 90 प्री-टर्म डिलीवरी में मेच्योर डिलीवरी की अपेक्षा कीटनाशक का असर ज्यादा पाया गया है।
अल्का एचसीएच पांच गुना ज्यादा, पैरा-पैरा डीडीई दो गुना ज्यादा, गामा एक्सईएच ढाई गुना ज्यादा पाया गया है। प्रियंका अग्रवाल पोलिसाइक्लिक एयरोमेटिक हाइड्रोकार्बन्स की जांच कर रही हैं।
उनके मुताबिक प्री टर्म डिलीवरी के मामले में महिलाओं में बेंजो ए पायरीन (नोन कार्सनोजन) चार गुना ज्यादा पाया गया है। उन्होंने बताया कि यह कैंसर का कारक है। यह समय से पहले पैदा हुए बच्चों में कैंसर का कारण बन सकता है।
प्रो. अजय तनेता के मुताबिक 200 से 250 सैंपल पर शोध किया जाना है। इसके बाद सही नतीजे तक पहुंचा जा सकेगा। प्री-टर्म डिलीवरी के अन्य कारण भी हो सकते हैं। अभी तक जांच में यह पाया गया है कि प्रदूषण भी कारण है।
इस तरह से बन रहा कारण
अागरा विवि
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शोधकर्ताओं की मानें तो प्रदूषण के चलते महिलाओं में खास किस्म का तनाव ‘आक्सीडेटिव स्ट्रेस’ पैदा होता है। इसके चलते डिलीवरी समय से पहले हो जाती है।
शोधकर्ता एसएन मेडिकल कालेज के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग और कुछ नर्सिंग होम से सैंपल ले रहे हैं। वर्ष 2014 में शोध कार्य शुरू किया गया।