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स्थापना दिवस: अपराध के तरीके बदले तो बदलती गई पुलिसिंग... आगरा पुलिस ने ऐसा तय किया कमिश्नरेट तक का सफर

Thu, 18 Apr 2024 12:02 PM IST
धीरेन्द्र सिंह आशीष शर्मा, आगरा

सार

आगरा पुलिस का 148 साल पुराना इतिहास है। इस दौरान अपराध के तरीके बदले तो पुलिसिंग का तरीका भी बदलता चला गया।  आइये जानते हैं किस तरह आगरा पुलिस ने कमिश्नरेट तक का सफर तय किया...
 
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आगरा पुलिस - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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आगरा पुलिस ब्रिटिश हुकूमत से अब कमिश्नरेट तक का सफर तय कर चुकी है। थानों की संख्या के साथ पुलिस के ओहदेदार भी बढ़ते गए। पहले गांवों में सुरक्षा के नाम पर बने चौकीदार अब ग्राम चौकीदार के रूप में हाईटेक व्यवस्था से जुड़ चुके हैं। काम का तौर-तरीका भी बदल गया है। चंबल के डकैतों की जगह पेशेवर अपराधियों और वर्चुअल डकैतों यानी साइबर अपराधियों ने ले ली है। गांव-गांव, शहर की गलियों तक फैले मुखबिर तंत्र भी अब हाईटेक होकर सूचनाओं का आदान-प्रदान कर रहे हैं। थानों की मदद के लिए साइबर सेल, फॉरेंसिक एक्सपर्ट भी मैदान में आ चुके हैं।
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1906 में बना था लोहामंडी थाना, अब होटल जैसी इमारत
अंग्रेजों ने वर्ष 1906 में सबसे पहले यहां लोहामंडी कोतवाली स्थापित की। यहां मुगल काल में शहंशाह अकबर के समय से गढि़या लुहार रहकर लोहे के हथियार बनाते थे, बाद में जगह बंदूकों ने ले ली। जीर्णशीर्ण भवन में कोतवाली अभी हाल तक चल रही थी। कमिश्नरेट बनने के बाद एक महीने पहले इसका स्वरूप बदल गया। थाना किसी होटल की इमारत से कम नहीं लगता। हेल्प डेस्क, पार्किंग, दरोगाओं के कक्ष सब बदल गए।

चंबल में था डकैतों का आतंक
आजादी से पहले या बाद, चंबल के बीहड़ कभी डकैतों और बागियों के नाम से थर्राया करते थे। उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश की सीमा में आने वाले चंबल नदी के किनारे के इलाके से अपहरण का कारोबार खूब चलता था। डकैत हत्या और डकैती तक करते थे। यही वजह थी कि मान सिंह, पान सिंह तोमर, फूलन देवी, जगजीवन परिहार, पुतली बाई, मलखान सिंह जैसे कई डकैत चर्चा में रहे। चंबल के बीहड़ में डकैतों को पकडऩे में पुलिस भी फेल हो जाती थी।

 

बना मिनी जामताड़ा, बढ़ी ऑनलाइन लूट
अंग्रेजी शासन काल में ही वर्ष 1875 में जैतपुर थाना और वर्ष 1889 में पिनाहट थाना स्थापित किया गया था। 2010 के बाद इन डकैतों की जगह हेलो गैंग ने ले ली। ऑनलाइन लूट बढ़ गई। चंबल के बीहड़ में भी ठगी का कारोबार शुरू हुआ। बेरोजगार युवा कॉल कर लोगों को नौकरी, इनाम और परिचित बनकर ठगी करने लगे। इनमें तीन थानों जैतपुर, पिनाहट और बाह थाना क्षेत्र के 22 गांव में साइबर ठगी के काले कारोबार से इसका नाम मिनी जामताड़ा के नाम से चर्चित हो गया। तत्कालीन आईजी ए सतीश गणेश ने अभियान चलाकर गांव-गांव जाकर जागरुकता की। गैंग भी पकड़े गए। मगर, अब भी इस पर रोक नहीं लग सकी।

 

कमिश्नरेट के थानों की स्थापना
नाम - थाना स्थापना - भवन निर्माण
कोतवाली - 1925-26 - 2009

लोहामण्डी - 1906
हरीपर्वत -1994 - 1997

रकाबगंज - 1901 -1988
ताजगंज -1889

छत्ता -1986 -1998
सदर - 1930

मलपुरा -1931 -1988
एत्मादपुर - 1948

अहारन (बरहन) - 1979-80
खन्दौली - 1947

बाह - 1927
पिनाहट -1889 - 2003

जैतपुर - 1875
फतेहाबाद - 1904 - 2008

डौकी - 1887
शमसाबाद - 1946 (रजिस्टर में पहला अपराध)

फतहपुर सीकरी - 1931
अछनेरा - 1906-1988

इरादतनगर - 1957
कागारौल - 1986 - 1988

सैंया - 1910
एत्माद्दौला - 1982 - 1988

 

हर जोन में बनी साइबर और सर्विलांस सेल
आजादी से पहले हो या फिर बाद में 110 साल में तकरीबन 25 थाने बन गए थे। नवंबर 2022 में आगरा को कमिश्नरेट का दर्जा मिला। 3 जोन बनाए गए। पुलिस अधिकारियों से लेकर पुलिसकर्मियों की संख्या बढ़ी। नए थानों की नींव रखी गई। साइबर थाना खुला। हर जोन में एक सर्विलांस और एक साइबर सेल हो गई है। हर मामलों में पुलिस कार्रवाई का असर दिखने लगा है।

 

पहले एसएसपी थे एचके कार
पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, 75वें एसएसपी के बाद आगरा को कमिश्नरेट का दर्जा मिला। पुलिस आयुक्त ने सुरक्षा की कमान संभाल ली। इतिहास की बात करें तो 1952 में एचके कार पहले एसएसपी थे। 1954 तक आगरा की कप्तानी संभाली। उनके बाद 1954 से 1955 तक एमसी त्यागी ने कमान संभाली। वर्ष 2009 में व्यवस्था में परिवर्तन हआ। डीआईजी के रूप में प्रेम प्रकाश को तैनाती मिली। 7वें डीआईजी के रूप में असीम अरुण 6 जनवरी 2011 से 20 मार्च 2012 तक रहे। सरकार बदलने पर एक बार फिर व्यवस्था बदली। मार्च 2012 में सुनील चंद वाजपेयी एसएसपी बन गए। 28 जून 2022 को 75वें एसएसपी के रूप में प्रभाकर चौधरी आए। मगर, नवंबर 2022 में कमिश्नरेट बनने के बाद उनका तबादला हो गया।

 

तीसरी आंख बनी पुलिस का मुखबिर तंत्र
आजादी के बाद पुलिसिंग में बदलाव हुआ। मुखबिर तंत्र मजबूत किया गया। शहरों से लेकर गांवों तक में पुलिस के मुखबिर सूचना के आदान प्रदान का बहुत बड़ा जरिया बन गए। यही वजह है कि अब भी पुलिस की केस डायरी में इन मुखबिरों का नाम आता है। मगर, इन मुखबिरों की जगह कैमरों और सर्विलांस ने ली। किसी भी अपराधी की लोकेशन से लेकर पहचान में यह मददगार साबित हो रहे हैं।

 

सोशल मीडिया और 112 ने बदला चौकीदार का स्वरूप
वर्तमान दौर में सोशल मीडिया और 112 ने चौकीदार का स्वरूप ही बदल दिया है। पुलिस आयुक्त जे रविन्दर गौड बताते हैं कि वर्तमान में पुलिस हेल्प लाइन नंबर 112 और सोशल मीडिया चौकीदार है। चौकीदार कम, बल्कि इन पर सूचनाओं की भरमार है। पीडि़त की शिकायत पर कार्रवाई से लेकर गोपनीयता तक का ख्याल इनके माध्यम से होता है। जागरूक लोग चौकीदार से ज्यादा भरोसा हेल्पलाइन नंबर, व्हाट्स एप, फेसबुक पर करते हैं। पुलिस को भी इसका फायदा मिला है। तत्काल सुनवाई से लेकर कार्रवाई में आसानी हो रही है।

 
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धरपकड़ से लेकर विवेचना तक में बदलाव
पुलिस आयुक्त ने बताया कि अंग्रेजों ने सत्ता के लिए पुलिस बनाई थी, लेकिन आज की पुलिसिंग जनता के लिए है। पुलिस का काम संवैधानिक अधिकारों से लेकर मानवाधिकारों की रक्षा करना है। समय के साथ पुलिसिंग में बदलाव भी नजर आने लगा है। जनता की सुनवाई अधिकारी अपने ऑफिस में बैठकर ऑनलाइन कर रहे हैं। अपराध और अपराधियों का डेटा सीसीटीएनएस से एक क्लिक पर मिल रहा है। पहले की पुलिस चार्जशीट लगाने तक सीमित रहती थी। वर्तमान में अपराधियों को सजा दिलाने के लिए ऑपरेशन कनविक्शन भी चलाया जा रहा है। इसके लिए अलग से प्रभारी भी नियुक्त हैं। अपराधी झूठ बोलकर अपराध नहीं किया या फिर गवाहों के मुकरने मात्र से बच नहीं सकता है। पुलिस की सीसीटीवी कैमरों के फुटेज, फिंगर प्रिंट, कॉल डिटेल से लेकर फोरेंसिक साक्ष्य मदद करते हैं। इनको कानून में अलग से जगह दी गई है। यही वजह है कि गवाह मुकर जाए भी तो डिजिटल साक्ष्यों से अपराधी को सजा जरूर मिलेगी।
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