वारिस की दुनिया उजड़ गई। काल बनकर गिरी आगरा विकास प्राधिकरण (एडीए) की छत ने उसकी पत्नी रेहाना और आठ साल की मासूम असमी की जान ले ली। ये होनी थी। क्योंकि वह अपने परिवार के साथ जिस मकान में रह रहा था, वह उसके नाम आवंटित नहीं था। एडीए के दलाल ने उससे मोटी रकम लेकर इसरार के नाम आवंटित इस मकान पर उसका कब्जा करा दिया था। एडीए कर्मचारियों की मिलीभगत से चल रहे इस खेल का खुलासा तब हुआ, जब वारिस के बगल में रह रहे पप्पू के मकान का असली आवंटी एडीए पहुंचा। उसके मकान पर एडीए के दलालों ने पप्पू का कब्जा करा दिया।
शहीद नगर ईडब्ल्यूएस मकान में हुए हादसे ने न सिर्फ एडीए के घटिया निर्माण की पोल खोल दी है, बल्कि मकानों के आवंटन की आड़ में चल रहे खेल को भी उजागर करना शुरू कर दिया है। दरअसल, मंटोला निवासी मोहम्मद इमरान कुरैशी सोमवार को एडीए अधिकारियों के पास अपने मकान के कागज लेकर पहुंचा। अधिकारियों ने जब उसके कागज देखे तो उनके होश उड़ गए। कागजों में ई-3/446 मकान उसके नाम आवंटित था। जबकि उसमें सफाई कर्मचारी पप्पू अपने परिवार के साथ रह रहा था। शनिवार को हादसे के दौरान उसका भी मकान धराशायी हो गया था। गनीमत रही कि उसके परिवार को खरोंच तक नहीं आई। इमरान का कहना है कि वर्ष 2008 में एडीए ने यह मकान उसके नाम आवंटित किया था। मगर, जब वह मौके पर गया तो आसपास काफी जलभराव हो रहा था। मकान की हालत भी ठीक नहीं थी। स्थिति को देखते हुए उसने यह मकान लेने से मना कर दिया। उसने एडीए अधिकारियों से गुजारिश की कि उसे कोई दूसरा मकान आवंटित कर दिया जाए। इसके बाद न तो एडीए ने उसकी सुनवाई की और न ही इमरान आवंटित मकान में रहने गया। एडीए के दलालों ने इसी का फायदा उठाया। उन्होंने एडीए कर्मचारियों की मिलीभगत से इस मकान पर पप्पू का कब्जा करा दिया। इमरान को जब इसका पता चला तो एडीए कर्मचारियों ने उसे दूसरी जगह मकान देने का आश्वासन देते रहे।
छानबीन में यह भी पता चला कि वारिस जिस मकान में रह रहा था, वह मकान मोहम्मद इसरार नाम के किसी शख्स को आवंटित किया गया था। मगर, मकानों की स्थिति देखने के बाद वह भी इसमें रहने नहीं आया था। एडीए कर्मचारियों ने इसी का लाभ उठाया और उस पर वारिस का कब्जा करा दिया।
यह दो मामले तो बानगीभर हैं। शहीद नगर के ईडब्ल्यूएस के अधिकतर मकानों पर मोटी रकम लेकर ऐसे ही कब्जे कराए गए हैं। अगर जांच शुरू होगी तो बहुत कम कब्जेदार ऐसे होंगे जो अपने मकान के कागज दिखा पाएंगे।
खाली मकानों पर रहती है दलालों की नजर
शहीद नगर ही नहीं, एडीए की जितनी भी आवासीय योजनाएं हैं, सभी में यह खेल चल रहा है। किसी वजह से यदि असल आवंटी मकान पर कब्जा नहीं ले पाता है तो यह दलाल किसी दूसरे का मोटी रकम लेकर कब्जा करा देते हैं। इनकी नजर ऐसे ही तमाम खाली मकानों पर रहती है।
वर्जन
मैने यह मकान एक दलाल के माध्यम से खरीदा था। उसने कहा था कि वह एडीए से इस मकान को उसे आवंटित करवा देगा। तब उसने यह मकान खाली बताया था। इसके लिए उसे 60 हजार रुपये दिए थे, मगर उसने मकान से संबंधित कोई कागज नहीं दिया था। मैं पिछले कई साल से इस मकान में रह रहा हूं।
- पप्पू, कब्जेदार, ई-3/446
वर्ष 2008 में एडीए ने मुझे ई-3/446 आवंटित किया था। यह मकान मेरे नाम था। आवंटन के बाद जब मैं कई महीने बाद मकान को देखने पहुंचा तो पीछे की तरफ पानी भरा हुआ था। इस पर मैने एडीए से दूसरा मकान आवंटित करने का निवेदन किया था। मुझे कोई दूसरा मकान दिया नहीं और मेरे मकान पर भी बाद में किसी का कब्जा करा दिया।
- मो. इमरान कुरैशी, आवंटी, ई-3/446
वर्जन
हादसे के बाद मकानों के आवंटियों की फाइल निकलवाई गई हैं। इसमें पता चला है कि वारिस जिस मकान में रह रहा था, वह मकान किसी इसरार के नाम आवंटित था। जल्द ही सभी मकानों के असल आवंटियों की पड़ताल कराई जाएगी।
- बाबू सिंह, संयुक्त सचिव, एडीए