आगरा। ‘मची है धूम शहे मशरिकैन आते हैं, हमारे गम की दवा, दिल का चैन आते हैं, नबी के साथ शिफाअत को हश्र में देखो, लहू में तर वो इमाम-ए-हुसैन आते हैं। कुछ इसी तरह के शेर और नारों के साथ मंगलवार को शहर भर में दो हजार से अधिक ताजियों को सुपुर्द-ए-खाक किया गया। अखाड़ेबाजों के हैरतअंगेज करतबों ने लोगों को हैरान कर दिया। सबसे पहले एतिहासिक फूलों का ताजिया उठाया गया, उसके बाद शहर के बाकी ताजिये। सुबह से शुरू हुआ जुलूसों का सिलसिला शाम तक चला।
तीनों करबला में मोहर्रम की 10 तारीख को हजारों ताजिये सुपुर्द-ए-खाक किए गए। न्यू आगरा की करबला में सर्वाधिक ताजिए दफनाए गए। सराख्वाजा, ताजगंज की गोबर चौकी की करबला में सैकड़ों ताजियों को सुपुर्द-ए-खाक किया गया। सैकड़ों लोग ताजिये के साथ मर्शिए, नौहाख्वानी और सलाम पेश करते हुए चल रहे थे। अखाड़ेबाज करतब दिखा रहे थे। खलिफाओं ने बान, बनेठी, लकड़ी पटा, गतका, लकड़ी, बिछुआ, हजारा, भौंरा, तलवार और भाले से लड़ाई का प्रदर्शन किया।
जुलूस की फूलों का ताजिया से शुरुआत
एतिहासिक फूलों का ताजिया पाय चौकी स्थित कटरा दबकैयान से पूर्वाह्न 11.30 बजे उठा। पाय चौकी, नीम दरवाजा, पीर कल्याणी, पालीवाल पार्क और सुल्तानगंज पुलिया होता हुआ तकरीबन एक बजे न्यू आगरा करबला पहुंचा। जुलूस की व्यवस्थाएं चौधरी सरफराज अहमद, समी आगाई, सैयद इरफान सलीम आदि ने संभाली। इसके बाद शहरभर से ताजिये के जुलूस निकले। तीनों करबला पर इन्हें सुपुर्द ए खाक किया गया। यहां दफनाने से पहले देश में अमन-चैन की दुआ की गई।
शिया समुदाय का जुलूस
सुबह साढ़े नौ बजे शिया समुदाय के ताजिये करबला को रवाना हुए। शुरूआत मीर अनीस के मशहूर मर्शिये ‘आज शब्बीर पे क्या आलम-ए-तन्हाई है...’ से हुई। ताजिये शाहगंज स्थित पुराने इमामबाड़े से निकले। जो साकेत कालोनी रोड, लाडली कटरा चौराहा, शाहगंज चौराहा, रुई की मंडी, रेलवे डबल फाटक, बारह खंभा, अर्जुन नगर होते हुए सराय ख्वाजा स्थित करबला में सुपुर्द-ए-खाक किए गए। जंजीर, छुरी, ब्लेड और कमां से खुद को लहूलुहान कर मातम किया। औरतें भी गम-ए-हुसैन में शरीक हुई। नौहाख्वानी अमीर अहमद, अली अफसर, बशारत अली, अब्बास अमीर जाफरी, राजा, आसिफ नकवी, नकवी हैदर आदि ने की। व्यवस्थाएं अंजुमन-ए-पंजेतनी के अध्यक्ष मसूद मेहंदी, उपाध्यक्ष अली मंजर, प्यारे मियां, मोहम्मद अहमद, डा. एमएच जाफरी, शबी जाफरी और शानू ने संभालीं। रात आठ बजे पुराने इमामबाड़े पर मजलिस शाम-ए-गरीबां को मौलाना इबभने हैदर ने खिताब फरमाया।