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चुनावी मुद्दा बनकर रह गया रेल विस्तार

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चुनावी मुद्दा बनकर रह गया रेल विस्तार - फोटो : अमर उजाला
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एटा। जिले में लोकसभा चुनाव में हर बार एक ही मुद्दा हावी रहता है। 70 साल से अपने विकास को तरस रहा रेलवे विस्तार इस बार भी प्रत्याशियों की जुबां पर छाया हुआ है। हालांकि अभी तक कसी सांसद ने रेल विस्तार को लेकर पहल ही नहीं की है। इसे लेकर लोगों में रोष नजर आ रहा है।
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जिले में लोकसभा चुनाव आते ही हर बार की तरह इस बार भी रेल विस्तार का मुद्दा बन गया है। इस मुद्दे के सहारे हर बार राजनीतिक दल और प्रत्याशी अपनी सियासी जमीन को मजबूत करते हैं। वर्ष 1956 में तत्कालीन सांसद और रेल राज्य मंत्री रोहन लाल चतुर्वेदी के बाद से अब तक किसी भी सांसद ने जिले के रेल परिवहन को बढ़ावा देने की पहल नहीं की। बस इस मुद्दे को प्रत्याशी और पार्टियां चुनाव जीतने का हथकंडा समझती रही हैं। आलम यह है कि हर बार रेल बजट से पहले और चुनावों के दौरान इस मुद्दे को हवा मिलती है। इसके बाद रेल विस्तार की मांग ठंडी पड़ जाती है। इस बार भी लोकसभा चुनाव में प्रत्याशियों की जुबां पर रेल विस्तार कराने का वादा छाया है।
पिटारे में बंद हो गए सर्वे और बजट
एटा को कासगंज से जोडने के लिए साल 2017 में रेल मंत्रालय ने 226 करोड़ रुपये का बजट मंजूर किया था। मगर आज तक रेल विस्तार को कोई काम होता नजर नहीं आया। इसके साथ ही एटा-अलीगढ़, एटा-मैनपुरी तक रेल परिवहन के लिए भी सर्वे हुए, मगर आगे कुछ नहीं हो सका।
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एक ट्रेन पर सीमित परिवहन
जिले में रेल परिवहन महज एक ट्रेन पर सीमित है। एटा-टूंडला के बीच चलने वाली पैसेंजर ट्रेन की लोगों को राहत देती है। इस ट्रेन को भी रेलवे कोहरे में बंद कर देता है। जबकि दो साल पहले शुरू हुई एटा-आगरा पैसेंजर बंद हो चुकी है।
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कहते हैं लोग
हर बार रेल विस्तार का वादा होता है, लेकिन कोई सांसद पहल नहीं करता। इस बार सोच समझकर वोट देंगे।
राकेश वार्ष्णेय
रेल विस्तार बस चुनावी मुद्दा बनकर रह गया है। वोट चाहिए, तो रेल विस्तार की बड़ी बातें कर दी जाती हैं। होता कुछ नहीं है।
डा. विशाल गुप्ता
रेल विस्तार के लिए हर सांसद प्रत्याशी वादा करता है, लेकिन चुनाव जीतने के बाद प्रत्याशी इसे भूल जाते हैं। इस बार ऐसा नहीं चलेगा।
पवन जैन
70 साल से जिले को रेल विस्तार की आस है। मगर आज तक कुछ नहीं हुआ। कोई भी जिले में रेल विस्तार को पहल नहीं करता।
आफताब अख्तर
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