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उपचार के नाम पर कर दिया जाता है रेफर

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‌ज‌िला अस्पताल - फोटो : amar ujala
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मैनपुरी। जिला चिकित्सालय का भवन भले ही बाहर से बढिया लगता हो लेकिन वास्तविकता यह है कि यहां के विभिन्न वार्ड खुद गंभीर रूप से बीमार हैं। आलम यह है कि यहां पर चिकित्सक बीमार लोगों का उपचार करने के स्थान पर उन्हें रैफर करने को प्राथमिकता देते हैं।
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यही कारण है कि जिला अस्पताल में कोई भी वार्ड हो वहां पर एक दो मरीजों के अलावा कोई भी भर्ती नहीं मिलता। इस संबंध में जब सीएमएस एके उपाध्याय का कहना है कि जिला अस्पताल में स्टाफ कम है। इसके बाद भी व्यवस्थाओं को दुरुस्त किया जा रहा है।

जिला अस्पताल में यहां भी कभी भी गोरखपुर जैसा हादसा हो सकता है। कारण जिला अस्पताल का भवन तो काफी अच्छा बना है लेकिन यहां पर सुविधाओं का नितांत अभाव है। आलम यह है कि बर्न वार्ड में जहां एसी सबसे जरूरी होता है ताकि संक्रमण न फैले वहां पर कूलर तक नहीं है।
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मरीजों को मात्र पंखे में उपचार दिया जाता है। इसके चलते गंभीर रूप से जले हुए लोगों को यहां पर चिकित्सक प्राथमिक उपचार देने के बाद सीधे आगरा या सैफई अस्पताल रैफर कर देते हैं। यही हाल हृदय रोग विभाग का भी है। यहां पर कोई चिकित्सक तक नही हैं।

ऐसे में यदि कोई हृदयाघात का मरीज आता है तो फिजिशियन उसे तत्काल रैफर कर देते हैं। वहीं गंभीर घायलों की सर्जरी तक अस्पताल में बमुश्किल होती है। इसका कारण यह है कि अस्पताल में तीन के स्थान पर मात्र एक ही सर्जन मौजूद है। वहीं अल्ट्रासाउंड विभाग भी खस्ताहाल है।

यदि किसी को आक्सीजन की जरूरत पड़े तो मौके पर अस्पताल में कर्मचारी तक नहीं मिलते हैं। जहां पर आक्सीजन सिलेंडर रखे जाते हैं वहां पर अधिकांश समय ताला लटका रहता है। जबकि वार्डों में पाइप लाइन के माध्यम से आक्सीजन देने की सुविधा भी मात्र दिखावा ही है। यह सिस्टम काम ही नहीं करता है। ऐसे में जररूत पड़ने पर ट्राली में रखकर आक्सीजन सिलेंडर लाया जाता है।

इमरजेंसी में तीमारदार अपने बीमार को लेकर बड़ी आशा से आते हैं लेकिन जिला अस्पताल की इमरजेंसी स्वयं खस्ताहाल है। यहां पर अधिकांश दवाइयां ही मौजूद नहीं रहती हैं। चिकित्सक जब बाहर से दवा लिखते हैं तो आएदिन तीमारदारों और इमरजेंसी के स्टाफ में विवाद होता है। ऐसे में चिकित्सक मरीज के आने पर उसे उपचार देने की अपेक्षा रैफर करने को ज्यादा तवज्जो देते हैं।
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