गुरुकुल में शिक्षा देते आचार्य देवराज शास्त्री।
एटा। वे गुरू हैं, लेकिन उनका वात्सल्य शिष्यों को मित्र सरीखा बनाता है। शिष्यों में संस्कारों के बीजारोपण कर वह पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव को कम कर रहे हैं। वैदिक धर्म, साहित्य और नैतिकता भूल रही युवा पीढ़ी को वह धर्म के मार्ग पर प्रशस्त कर रहे हैं। नौनिहालों को राष्ट्र और धर्म रक्षा के लिए तैयार कर रहे हैं। जिले में आचार्य देवराज शास्त्री एक ऐसी शख्सियत है, जो नए दौर की नई पीढ़ी को संस्कृति से रूबरू कराते हैं। शहर के सबसे पुराने गुरुकुल में अपनी पाठशाला के माध्यम से शिष्यों को ज्ञान के संस्कार देते हैं।
शहर के कासगंज रोड पर संचालित आर्ष गुुरुकुल की बागडोर संभालने वाले आचार्य देवराज शास्त्री परिचय के मोहताज नहीं हैं। उनके ज्ञान और पहल का प्रभाव के कारण अन्य जिलों के लोग आकर अपने बच्चों को गुरुकुल छोड़ जाते हैं। बताया जाता है कि आचार्य देवराज शास्त्री का मन और मस्तिष्क विद्यार्थी जीवन से भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत रहा और गुरुकुल में उन्होंने शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने मध्यमा, उत्तर मध्यमा, शास्त्री, आचार्य की परीक्षा उत्तीर्ण कर गुरु के निर्देश पर 1960 में आर्ष गुरुकुल के संचालन की जिम्मेदारी ली। इसके बाद उन्होंने संस्कृति और वेदों के माध्यम से विद्यार्थियों को पुष्पित, पल्लवित करना शुरू कर दिया।
बदलते दौर में लोग पाश्चात्य संस्कृति की ओर बढ़ चले हैं, ऐसे में वह भारतीय संस्कृति और संस्कारों की वकालत कर रहे हैं। बच्चों को गुरुकुल तक लाना, उनको प्रेरित करना जैसे काम कर वह गुरू कर्तव्य को पूरा कर रहे हैं। साथ ही देश-विदेश में भी उनके ज्ञान का डंका है। तमाम जगह वे शिविर लगाकर लोगों को भारतीय संस्कृति से जोड़ते हैं। आचार्य श्री के शिष्य बीबीसी लंदन, मॉारीशस जैसे शहरों में अपनी संस्कृति को जीवंत बनाए हैं। आलम यह है कि गुरुकुल से शिक्षा-दीक्षा पूरी कर निकले चार हजार से भी अधिक शिष्य दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में संस्कृत, संस्कृति, नैतिकता के साथ सांस्कृतिक मूल्यों का अधिकार भारतीय समाज को दिलाने का काम कर रहे हैं। वे कहते है उनका प्रयास संस्कृति से युवाओं को जोड़ने और सांस्कृतिक मूल्यों को अधिकार दिलाने का है।