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नियमों को ताक पर रख काम कर रहे रेलवे के इंजीनियर

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डैमो
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मथुरा। रेलवे में हो रहे निर्माण कार्यों में मानकों का कतई ध्यान नहीं रखा जा रहा है। डेढ़ करोड़ की लागत से राधाकुंड में बना स्टेशन एक महीने भी नहीं चला। अब इंजीनियर एक दूसरे को दोषी ठहरा रहे हैं। इस समय रेलवे के मथुरा सेक्शन में 700 करोड़ के काम हो रहे हैं लेकिन हर जगह से शिकायतें गूंज रही हैं।
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कई इंजीनियर तो ऐसे हैं जो जिन्होंने अपने रिश्तेदारों को ठेके दिला रखे हैं। अधिकतर कार्यस्थलों पर प्रोजेक्ट बोर्ड भी नहीं लगाए गए हैं। सुरक्षा के इंतजाम भी पूरे नहीं हैं। रेलवे द्वारा मथुरा से पलवल तक करीब सात सौ करोड़ रुपये के निर्माण कार्य कराए जा रहे हैं। सबसे बड़ी लागत का काम मथुरा से पलवल के बीच डाली जा रही थर्ड लाइन का है।

इसकी अनुमानित लागत करीब साढ़े छह सौ करोड़ रुपये बताई जाती है। इसके अलावा जंक्शन यार्ड में आधुनिक आरआरआई केबिन का भवन बनाया जा रहा है। यहां कहीं भी कोई प्रोजेक्ट बोर्ड नही लगाया गया है।
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प्रोजेक्ट बोर्ड पर काम कर रही संस्था का नाम, निर्माण करा रहे ठेकेदार का नाम, निर्माण की अनुमानित लागत, काम कब तक पूरा होगा और बनाए जा रहे भवन का मानचित्र आदि होता है। लेकिन अधिकतर निर्माण स्थलों से प्रोजेक्ट बोर्ड नदारद हैं। साथ ही सुरक्षा के भी पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं। इसी के चलते मई माह में निर्माण कार्य में लगा ट्रैक्टर प्लेटफार्म संख्या दो के ट्रैक पर गिर गया था।

लगा रहे आरोप प्रत्यारोप
मथुरा। विभाग में आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। रेलवे निर्माण शाखा ने जल भराव के लिए सिग्नल एंड टेलीकॉम विभाग के सिर इसका ठीकरा फोड़ा है। निर्माण से जुड़े इंजीनियरों का कहना है कि एस एंड टी विभाग द्वारा केबिल बॉक्स के लिए बनाए गए चैम्बर की वजह से पानी भरा और स्टेशन का फर्श आदि बैठ गया। वहीं, एस एंड टी विभाग का कहना है कि निर्माण विभाग ने जल भराव की संभावनाओं को तलाशे बिना ही काम पूरा कर दिया। स्टेशन की बाउंड्रीवाल भी पूरी नहीं बनाई।

‘निर्माण स्थल पर प्रोजेक्ट बोर्ड नहीं लगे हैं, इसे दिखवाया जाएगा। राधाकुंड स्टेशन को लेकर गठित जांच टीम रिपोर्ट बना रही है। उसके बाद ही जिम्मेदारी तय की जाएगी।’
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संचित त्यागी, डीसीएम/पीआरओ।
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