मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर करना। आज यह पंक्तियां उस समय पूरी तरह से सटीक नजर आईं जब एक पुलिसकर्मी ने बदहवास अवस्था में खून के लिए परेशान घूम रहे युवक की पत्नी को खून देकर जान बचा दी। एक आरक्षी ने अपना रक्त एक मुस्लिम महिला को दिया।
शहंशाह निवासी गांव देवरी थाना सोरों की पत्नी अमीना की शहर के एक नर्सिंग होम में प्रसव होना था। महिला को खून की कमी थी और उसकी हालत काफी खराब थी। चिकित्सक ने शहंशाह से ब्लड लाने को कहा। उसने अपने परिवार के लोगों के ब्लड का परीक्षण कराया, लेकिन किसी का भी ब्लड ग्रुप नहीं मिला। परेशान शहंशाह पर क्राइम ब्रांच आरक्षी दिनेश रावत की नजर पड़ी तो उसने बिना किसी जान पहचान के शहंशाह से बदहवासी की स्थिति में घूमने का कारण पूछा। जब शहंशाह ने पूरा मामला बताया और ब्लड की जरूरत की बात कही। संयोग से आरक्षी दिनेश का ब्लड ग्रुप पॉजिटिव था। उसने तत्काल खून दे दिया। दिनेश का खून अमीना को चढ़ाया गया। जिससे अमीना और उसकी गर्भस्थ शिशु की जान बच सकी। शहंशाह के परिवार ने दिनेश का आभार जताया। वहीं पुलिस ने दिनेश के कार्य और सोच की सराहना की।