देहरादून घंटाघर पर पसरा सन्नाटा
- फोटो : AmarUjala
एटा। कहते हैं घर में घड़ी की रुकी हुई सुई नहीं होनी चाहिए। ऐसा माना जाता है कि इससे जीवन की रफ्तार रुक जाती है, लेकिन अपने शहर की नाक घंटाघर में लगी घड़ी की धड़कन सालों से रुकी हुई है। घड़ी की सुइयां और पुर्जे जर्जर हाल में हैं। वहीं पालिका रुके पड़े सिस्टम को सही कराने में दिलचस्पी लेती नजर नहीं आती। साथ ही घंटाघर की दो मीनारें में भी जर्जर हाल में हैं।
घंटाघर में काफी ऊपर लगी बंद घड़ी की तरह। नगर पालिका के अफसरों को भी पता है कि ये घड़ी ऐसे ठीक नहीं होगी। लेकिन वे कुछ कर तो सकते हैं, लेकिन कुछ कर नहीं रहे। पिछले साल घड़ी की मरम्मत के लिए बरेली में कारीगर को तलाश किया गया था। मगर कारीगर नहीं मिलने से घड़ी को उसके हाल पर छोड़ दिया गया। घड़ी के चारो ओर बनी चार मीनारों में से एक मीनार जर्जर हालत में है, लेकिन जिम्मेदारों ने इसकी सुध नहीं ली।
व्यापारी सत्येंद्र कुमार कहते हैं कि घड़ी कुछ साल पहले चला करती थी। मगर अब बस दिखावा बनकर रह गई है। सुधीर कुमार कहते हैं कि घंटाघर की घड़ी के साथ घंटा बजने से लोगों को समय पता चलता था। मगर अब घंटाघर के हाल की किसी को सुध नहीं है। वार्ड सभासद मिल्की जैन कहते हैं कि घड़ी को सुधरवाने के प्रयास चल रहे हैं। बोर्ड में बैठक में इसके लिए प्रस्ताव रखेंगे।
यह है घंटाघर का इतिहास
शहर के घंटाघर का निर्माण वर्ष 1903 में नगर पालिका ने कराया था। करीब 100 फुट लंबे घंटाघर में 28 इंच की चार घड़ियां लगी हैं। जो समय बताने के साथ घंटा बजाती हैं। पूर्व सभासद सुजीत देव वार्ष्णेय बताते हैं कि घड़ियों की मरम्मत वर्ष 2007 में कराया गया था। उन्होंने बताया कि घड़ियोें की सुबह-शाम चाबी भरने के लिए कर्मचारी की तैनाती की गई थी, लेकिन बाद में उसे हटा दिया गया। पालिका की अनदेखी के चलते घंटाघर जर्जर हो चला है।