कासगंज। जिस उम्र में बच्चे ठीक से अपने लिखना-पढ़ना भी नहीं जानते उस उम्र में गंजडुडवारा क्षेत्र के मोहम्मद मआज कुरआन-ए-मजीद को बेहतरीन तरीके से पढ़ता है। छह वर्ष की उम्र में बच्चे पूरा दिन खेलने और शरारत में गुजार देते हैं उस उम्र में मोहम्मद मआज हाफिज-ए-कुरआन बन गए हैं। जब वह बिना देखे जब कुरआन की तिलावत करते हैं तो सुनने वाले बड़े-बड़े आलिम भी हैरान हो जाते हैं।
छह वर्षीय मोहम्मद मआज गंजडुडवारा के मोहल्ला बरी थोक निवासी मौलाना मोहम्मद जैनुल आबदीन का पुत्र है। 4 अप्रैल 2011 को जन्मे बालक मआज ने 4 साल की उम्र में कुरान मुकम्मल कर लिया था। इसके बाद पिता जैनुल आबदीन मआज को हाफिज बनाने के लिए मेहनत की। हाल ही में जामियातुल बरकात में एजाज-ए-कुरआन कांफ्रेंस में मआज की दस्तारबंदी कर उसकी इस कामयाबी की सराहना की।
यह दस्तारबंदी मुफ्ती आफाक अहमद, सैय्यद शाह मोहम्मद अमान मियां बरकाती ने की। कांफ्रेंस में आए आलिमों ने मजाज को दुआओं से नवाजा।
पिता मौलाना जैनुलआबदीन ने कहा कि कुरआन बिना देखे याद कर लेने वाले को हाफिज कहा जाता है। उन्होंने कहा कि इतनी छोटी उम्र में हाफिज ए कुरआन बनने वाले बहुत ही कम बच्चे होते हैं।
आईएएस बनाने का था सपना
पिता मौलाना जैनुल आबदीन ने बेटे पर फक्र करते हुए कहा कि उनका बेटा दुनिया में नाम रोशन करेगा। उसने आईएएस बनाने का सपना देखा था, लेकिन एक दिन अचानक मआज ने उन्हें कुरआन की आयत हिफ्ज करके सुनाई, तो उन्हें लगा कि अल्लाह कुछ और चाहता है। उनका सपना बच्चे को आईएएस बनाने का है जिससे वह देश की सेवा कर सके।